उत्तराखंड में गैर-हिंदुओं के प्रवेश को रोकने को लेकर बहस तेज है, लेकिन फिलहाल कोई राज्य-स्तरीय कानून लागू नहीं हुआ है। अभी यह केवल प्रस्ताव और स्थानीय संतों की मांग तक सीमित है। मुख्य चर्चा हरिद्वार के कुंभ क्षेत्र, हर की पैड़ी और गंगा घाटों को ‘पवित्र सनातन नगरी’ घोषित करने पर हो रही है।
उत्तराखंड (Uttarakhand) में इन दिनों धार्मिक स्थलों पर गैर-हिंदुओं की एंट्री (Non-Hindu Entry Ban) को लेकर सियासी और सामाजिक पारा चढ़ा हुआ है। सोशल मीडिया पर कई तरह के दावे किए जा रहे हैं, लेकिन हकीकत क्या है? क्या वाकई सरकार ने कोई फैसला लिया है?
यहाँ जानिए इस पूरे विवाद, सरकार के रुख और मौजूदा स्थिति का पूरा विश्लेषण।

1. हरिद्वार कुंभ क्षेत्र: क्या है सरकार का प्लान?
पुष्कर सिंह धामी सरकार हरिद्वार के कुंभ क्षेत्र (Kumbh Area) और ऋषिकेश के करीब 105 गंगा घाटों पर गैर-हिंदुओं के प्रवेश को प्रतिबंधित करने की संभावनाओं पर विचार कर रही है।
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प्रस्ताव: आधिकारिक सूत्रों के अनुसार, इस पूरे क्षेत्र को “पवित्र सनातन नगरी” घोषित करने पर अध्ययन चल रहा है।
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मौजूदा स्थिति: अभी तक इस संबंध में कोई अंतिम नोटिफिकेशन (Official Notification) जारी नहीं किया गया है।
2. श्री गंगा सभा और 1916 का नियम
हर की पैड़ी का प्रबंधन संभालने वाली श्री गंगा सभा ने मांग की है कि कुंभ क्षेत्र को आधिकारिक तौर पर ‘हिंदू क्षेत्र’ घोषित किया जाए।
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इतिहास का हवाला: गंगा सभा ने 1916 के नगरपालिका नियमों का जिक्र किया है। उनका कहना है कि ब्रिटिश काल में भी हर की पैड़ी के 7-8 किलोमीटर के दायरे में गैर-हिंदुओं का प्रवेश निषिद्ध था।
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मांग: सभा चाहती है कि उसी पुरानी परंपरा को अब कानूनी रूप देकर बहाल किया जाए।
3. विवाद क्यों बढ़ा? (ताजा घटनाएं)
हाल ही में हर की पैड़ी पर दो युवकों के ‘शेख’ जैसी वेशभूषा में घूमने के बाद यह विवाद गहरा गया। इसके बाद संत समाज ने पुलिस प्रशासन से सख्त कार्रवाई की मांग की।
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सोशल मीडिया के दावे: 2027 के अर्धकुंभ में सिर्फ हिंदुओं को एंट्री मिलने के दावे वायरल हो रहे हैं।
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सच्चाई: सरकार ने अभी सिर्फ “गंभीरता से विचार” और “अध्ययन” की बात कही है, कोई आदेश पारित नहीं किया है।
4. क्या यह कानूनी रूप से संभव है?
इस प्रस्ताव पर कानूनी विशेषज्ञों की राय बटी हुई है।
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संवैधानिक सवाल: सार्वजनिक स्थलों पर किसी धर्म विशेष के लोगों को रोकना भारतीय संविधान के मौलिक अधिकारों (समानता और आवाजाही की स्वतंत्रता) के खिलाफ माना जा सकता है।
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कानूनी चुनौती: अगर सरकार ऐसा नियम बनाती है, तो इसे कोर्ट में चुनौती दी जा सकती है। हालांकि, धार्मिक संस्थानों को अपने आंतरिक नियम बनाने का सीमित अधिकार होता है।
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विरोध: कांग्रेस उपाध्यक्ष सूर्यकांत धस्माना ने इसे “गंगा-जमुनी तहजीब” के खिलाफ बताया है।
5. केदारनाथ और चारधाम पर बहस
सिर्फ हरिद्वार ही नहीं, बल्कि केदारनाथ (Kedarnath) और चारधाम को लेकर भी ऐसी ही मांगें उठी हैं।
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2025 में एक भाजपा विधायक ने केदारनाथ में गैर-हिंदुओं के प्रवेश पर रोक की मांग की थी।
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आरोप था कि कुछ लोग पवित्रता भंग कर रहे हैं।
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देहरादून के पास कुछ मंदिरों में “गैर-हिंदुओं का प्रवेश वर्जित” के बोर्ड लगाए गए थे, जिस पर पुलिस ने एफआईआर भी दर्ज की थी।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQs)
Q: क्या उत्तराखंड के मंदिरों में गैर-हिंदुओं की एंट्री बैन हो गई है? A: नहीं, अभी तक पूरे राज्य या चारधाम के लिए कोई ऐसा समान कानून लागू नहीं हुआ है। यह अभी सिर्फ एक प्रस्ताव और मांग है।
Q: क्या हर की पैड़ी पर गैर-हिंदू नहीं जा सकते? A: फिलहाल कोई आधिकारिक सरकारी रोक नहीं है, लेकिन श्री गंगा सभा और स्थानीय संत वहां पुराने नियमों (1916) को बहाल करने की मांग कर रहे हैं।
Q: पवित्र सनातन नगरी का क्या मतलब है? A: इसका अर्थ उस क्षेत्र को विशेष धार्मिक जोन घोषित करना है, जहां मांस-मदिरा और गैर-हिंदू गतिविधियों/प्रवेश पर पूर्ण प्रतिबंध हो सकता है।
उत्तराखंड में यह मुद्दा अभी ‘विचाराधीन’ (Under Consideration) श्रेणी में है। सरकार संतों की भावनाओं और संविधान के नियमों के बीच संतुलन बनाने की कोशिश कर रही है।




