कुवैत सरकार ने एक ऐतिहासिक और चौंकाने वाला फैसला लेते हुए यूनाइटेड किंगडम (लंदन) में तैनात अपने ही राजदूत बद्र मोहम्मद अल-अवदी (Badr Mohammed Al-Awadhi) की नागरिकता वापस ले ली है। यह कूटनीतिक जगत में एक बेहद दुर्लभ मामला है जब किसी सेवारत राजनयिक (Diplomat) को उसी देश की नागरिकता से वंचित कर दिया गया है, जिसका वह विदेश में प्रतिनिधित्व कर रहा था। कुवैत के आधिकारिक राजपत्र ‘कुवैत टुडे’ के अनुसार, गृह मंत्री शेख फहद अल-यूसुफ की अध्यक्षता वाली सर्वोच्च समिति की सिफारिश पर एक अमीरी डिक्री जारी की गई है, जिसके तहत अल-अवदी की नागरिकता को तत्काल प्रभाव से रद्द कर दिया गया है।
नागरिकता रद्द होने की असल वजह
राजदूत बद्र मोहम्मद अल-अवदी की नागरिकता सीधे तौर पर उनकी अपनी किसी गलती के कारण नहीं, बल्कि उनके पिता की नागरिकता रद्द होने के कारण ‘डिपेंडेंसी’ (Dependency) के आधार पर छीनी गई है। रिपोर्ट के अनुसार, उनके पिता मोहम्मद इब्राहिम अल-अवदी, जो पूर्व सुरक्षा अधिकारी थे, की नागरिकता मरणोपरांत रद्द कर दी गई थी। जांच में पाया गया कि पिता की नागरिकता मूल फाइल में झूठी जानकारी या फर्जीवाड़े के आधार पर हासिल की गई थी। कुवैत के नागरिकता कानून के अनुच्छेद 13 और 21 बीआईएस (bis) के तहत, अगर मूल नागरिकता गलत तरीके से पाई गई है, तो उस पर आश्रित (बेटे-बेटियों) की नागरिकता भी अपने आप रद्द हो जाती है।
कूटनीतिक हलकों में हड़कंप और मौजूदा स्थिति
इस फैसले ने कुवैत के विदेश मंत्रालय को लंदन जैसे महत्वपूर्ण शहर में एक अजीबोगरीब स्थिति में डाल दिया है। जिस समय यह डिक्री जारी की गई, अल-अवदी आधिकारिक तौर पर वहां कुवैत का प्रतिनिधित्व कर रहे थे। अब तक अल-अवदी की तरफ से कोई सार्वजनिक बयान नहीं आया है और उनके सोशल मीडिया अकाउंट्स भी बंद हो गए हैं। राजनयिक सूत्रों का कहना है कि वे बिना किसी शोर-शराबे के कुवैत लौट सकते हैं। हालांकि, एक राजदूत का पद पर रहते हुए स्टेटलेस (बिना देश का नागरिक) हो जाना अंतरराष्ट्रीय कूटनीति में एक अभूतपूर्व घटना है।
कुवैत सरकार का नागरिकता ‘सफाई’ अभियान
राजदूत पर की गई यह कार्रवाई कुवैत सरकार द्वारा 2024 से चलाए जा रहे एक व्यापक अभियान का हिस्सा है। सरकार ने राष्ट्रीय पहचान की रक्षा और कानून के शासन को मजबूत करने के लिए नागरिकता रिकॉर्ड की जांच शुरू की है। इस अभियान का उद्देश्य उन लोगों की पहचान करना है जिन्होंने फर्जीवाड़े, दोहरी नागरिकता या गलत जानकारी देकर कुवैती नागरिकता हासिल की है। इस जांच के दायरे में केवल आम लोग ही नहीं, बल्कि पूर्व सांसद, सैन्य अधिकारी, शिक्षाविद और अब वरिष्ठ राजनयिक भी आ गए हैं।
कानूनी अधिकार और मानवाधिकारों पर सवाल
कुवैत में नागरिकता से जुड़े फैसले संप्रभुता (Sovereignty) के कार्य माने जाते हैं, जिसका मतलब है कि इन्हें अदालत में चुनौती देना बेहद मुश्किल होता है। अल-अवदी के पास कानूनी विकल्प बहुत सीमित हैं, हालांकि वे शिकायत दर्ज कराने की कोशिश कर सकते हैं। मानवाधिकार समूहों ने चेतावनी दी है कि इस तरह के अभियानों से कई लोग ‘स्टेटलेस’ (बिना किसी देश के नागरिक) हो सकते हैं। कुवैत दोहरी नागरिकता की अनुमति नहीं देता है, इसलिए नागरिकता छिन जाने का मतलब है कि प्रभावित व्यक्ति शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार जैसी बुनियादी सरकारी सुविधाओं से वंचित हो सकता है।
अभियान से जुड़े प्रमुख आंकड़े
कुवैत में चल रहे इस ‘डिनेचुरलाइजेशन’ (नागरिकता समाप्ति) अभियान ने हजारों लोगों को प्रभावित किया है। नीचे दी गई तालिका में हालिया स्थिति को दर्शाया गया है:
| विवरण | जानकारी |
|---|---|
| अभियान की शुरुआत | मध्य 2024 |
| हाल ही में रद्द किए गए मामले | 1,291 से अधिक मामले (रेफर किए गए) |
| प्रभावित लोग | पूर्व सांसद, सैन्य अधिकारी, राजदूत और अन्य वरिष्ठ अधिकारी |
| दायर की गई अपीलें | 14,000 से अधिक |
| मुख्य कारण | जालसाजी, झूठी जानकारी और दोहरी नागरिकता |
Last Updated: 17 January 2026




