Meta ने खाड़ी देशों में इंटरनेट के बड़े प्रोजेक्ट पर लगाई रोक, युद्ध और सुरक्षा कारणों से लिया गया फैसला
फेसबुक की पेरेंट कंपनी Meta ने मध्य पूर्व में चल रहे सैन्य तनाव और सुरक्षा जोखिमों को देखते हुए अपने एक बड़े सबसी इंटरनेट केबल प्रोजेक्ट पर फिलहाल रोक लगा दी है। ‘2Africa’ नाम का यह प्रोजेक्ट दुनिया का सबसे लंबा समुद्री केबल प्रोजेक्ट है, जिसे अफ्रीका, यूरोप और एशिया के देशों में इंटरनेट कनेक्टिविटी सुधारने के लिए बनाया जा रहा था। मिडिल ईस्ट में अमेरिका, इजरायल और ईरान के बीच बढ़ते तनाव की वजह से तकनीकी संचालन को असुरक्षित माना जा रहा है।
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प्रोजेक्ट रुकने की मुख्य वजह और ताजा स्थिति क्या है?
प्रोजेक्ट के फारस की खाड़ी वाले हिस्से, जिसे ‘Pearls’ सेगमेंट कहा जाता है, पर काम पूरी तरह से ठप हो गया है। केबल बिछाने वाली फ्रेंच कंपनी Alcatel Submarine Networks (ASN) ने ‘Force Majeure’ लागू कर दिया है। इसका मतलब है कि युद्ध और बाहरी हालातों के कारण कंपनी अब अनुबंध की शर्तों को पूरा करने में असमर्थ है। वर्तमान में केबल बिछाने वाला जहाज ‘Ile De Batz’ सऊदी अरब के दम्मम के पास समुद्र में खड़ा है और आगे नहीं बढ़ पा रहा है।
इस बड़े प्रोजेक्ट से जुड़ी मुख्य जानकारी
| प्रोजेक्ट का नाम | 2Africa (Pearls Segment) |
|---|---|
| कुल लंबाई | 45,000 किलोमीटर |
| डेटा क्षमता | 180 Tbps तक |
| प्रभावित देश | कतर, ओमान, यूएई, बहरीन, कुवैत, इराक, भारत, सऊदी अरब |
| मुख्य निवेशक | Meta, stc, China Mobile, Vodafone, Orange |
| वैकल्पिक निवेश | Ooredoo द्वारा 500 मिलियन डॉलर का लैंड रूट प्रोजेक्ट |
इस प्रोजेक्ट के रुकने से खाड़ी देशों में हाई-स्पीड इंटरनेट के विस्तार की गति धीमी हो सकती है। समुद्री रास्तों में बढ़ते खतरे को देखते हुए कतर की टेलिकॉम कंपनी Ooredoo ने अब जमीन के रास्ते डेटा कॉरिडोर बनाने पर काम शुरू किया है। कंपनी ने इराक और तुर्की के जरिए एक नया रास्ता तैयार करने के लिए 500 मिलियन डॉलर के निवेश का ऐलान किया है ताकि रेड सी और स्ट्रेट ऑफ होर्मुज के जोखिमों से बचा जा सके।
आम जनता और प्रवासियों पर क्या असर होगा?
दुनिया भर का 95 प्रतिशत से अधिक इंटरनेट ट्रैफिक इन्हीं समुद्री केबलों के जरिए चलता है। इस प्रोजेक्ट के जरिए भारत, पाकिस्तान और खाड़ी देशों के बीच डेटा ट्रांसफर की क्षमता कई गुना बढ़नी थी। काम रुकने से इंटरनेट की स्पीड और कनेक्टिविटी में होने वाले बड़े सुधारों में देरी होगी। विशेषज्ञों का कहना है कि जब तक सैन्य क्षेत्र में स्थिति सामान्य नहीं होती, तब तक जहाजों और तकनीकी कर्मचारियों को वहां भेजना संभव नहीं होगा क्योंकि यह जान-माल का बड़ा जोखिम है।




