IEA का बड़ा फैसला: होर्मुज विवाद के कारण बाज़ार में उतारे 400 मिलियन बैरल तेल, क्रूड ऑयल के गिरे दाम
होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) के बंद होने के बाद दुनियाभर में तेल संकट गहरा गया है। इसे देखते हुए इंटरनेशनल एनर्जी एजेंसी (IEA) ने इतिहास का सबसे बड़ा फैसला लिया है। IEA ने दुनिया भर के बाज़ार में 400 मिलियन बैरल इमरजेंसी तेल उतारने की घोषणा की है। इस फैसले के बाद ब्रेंट क्रूड ऑयल के दाम 120 डॉलर से गिरकर 90-92 डॉलर प्रति बैरल पर आ गए हैं, जिससे आम जनता और गल्फ देशों में रहने वाले लोगों को थोड़ी राहत मिली है।
होर्मुज बंद होने से दुनिया भर में क्या असर हुआ
28 फरवरी 2026 को शुरू हुए सैन्य हमलों के बाद 2 मार्च को ईरान ने होर्मुज जलडमरूमध्य को पूरी तरह बंद कर दिया था। इसके कारण मार्च के महीने में हर दिन 8 मिलियन बैरल तेल की सप्लाई रुक गई, जो पूरी दुनिया के उत्पादन का लगभग 8 प्रतिशत हिस्सा है। कुवैती क्रूड ऑयल की कीमत 143 डॉलर प्रति बैरल के पार चली गई। जेपी मॉर्गन के जानकारों ने चेतावनी दी है कि अगर यह बंदी जारी रही तो हर दिन 12 मिलियन बैरल तक की सप्लाई प्रभावित हो सकती है। ईरान का कहना है कि रास्ता केवल अमेरिका और इस्राइल के जहाजों के लिए बंद है, लेकिन सुरक्षा कारणों से बाकी व्यापारिक जहाज भी इस रास्ते से नहीं गुज़र रहे हैं।
किन देशों ने जारी किया अपना रिज़र्व तेल
तेल के बढ़ते दामों और महंगाई को रोकने के लिए IEA के 32 सदस्य देशों ने एक साथ मिलकर 400 मिलियन बैरल तेल निकालने पर सहमति जताई। यह तेल अगले 90 से 120 दिनों के अंदर बाज़ार में आएगा। इस कदम को IEA के 50 साल के इतिहास का सबसे बड़ा फैसला माना जा रहा है। दुनिया भर के प्रमुख देशों ने इसमें अपना-अपना योगदान दिया है।
| देश | जारी किया गया तेल (बैरल) |
|---|---|
| अमेरिका (US) | 172 मिलियन |
| जापान | 80 मिलियन |
| दक्षिण कोरिया | 22.46 मिलियन |
| जर्मनी | 19.5 मिलियन |
| फ्रांस | 14.5 मिलियन |
| ब्रिटेन (UK) | 13.5 मिलियन |
गल्फ में रहने वालों पर क्या होगा असर
गल्फ देशों जैसे सऊदी अरब, कुवैत और यूएई की अर्थव्यवस्था सीधे तौर पर तेल से जुड़ी है। कच्चे तेल के उत्पादन और सप्लाई में कटौती के कारण इन देशों की आमदनी पर सीधा असर पड़ता है। अमेरिका के राष्ट्रपति ने इस रास्ते को सुरक्षित करने के लिए युद्धपोत भेजने की बात कही है। IEA के प्रमुख फातिह बिरोल ने इसे अभूतपूर्व संकट बताया है। अगर हालात लंबे समय तक ऐसे ही रहे तो ट्रांसपोर्ट से लेकर रोज़मर्रा की चीज़ों के दाम बढ़ सकते हैं, जिसका असर गल्फ में काम करने वाले भारतीय प्रवासियों की नौकरी और खर्चों पर पड़ सकता है।




