Strait of Hormuz: ट्रंप बोले ‘मदद रास्ते में है’, सहयोगियों ने सैन्य साथ देने से किया मना, तेल 100 डॉलर के पार
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) में तेल की सप्लाई सुरक्षित करने के लिए ‘मदद रास्ते में है’ का नारा दिया है। 16 मार्च 2026 तक चले इस संघर्ष के कारण वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की कीमतें 105 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच गई हैं। अमेरिका ने चीन, ब्रिटेन और जापान जैसे देशों से अपनी नौसेना भेजने की अपील की है ताकि इस महत्वपूर्ण समुद्री रास्ते को खुला रखा जा सके। हालांकि, ब्रिटेन और फ्रांस जैसे प्रमुख सहयोगियों ने सीधे सैन्य कार्रवाई में शामिल होने के प्रस्ताव को ठुकरा दिया है।
ट्रंप की सैन्य गठबंधन की अपील पर दुनिया का क्या है रुख?
ट्रंप ने स्पष्ट रूप से कहा है कि जो देश इस रास्ते से तेल का लाभ उठाते हैं, उन्हें इसकी सुरक्षा की जिम्मेदारी भी लेनी चाहिए। ब्रिटेन के प्रधानमंत्री कीर स्टार्मर ने युद्ध में शामिल होने से इनकार करते हुए केवल बचाव के लिए ड्रोन तैनात करने की बात कही है। फ्रांस और जर्मनी ने भी अमेरिकी नेतृत्व वाले मिशन से दूरी बना ली है और इसे अपना युद्ध मानने से इनकार कर दिया है। जापान और ऑस्ट्रेलिया ने भी अपनी कानूनी सीमाओं और वर्तमान स्थिति का हवाला देते हुए युद्धपोत भेजने में असमर्थता जताई है।
युद्ध की वर्तमान स्थिति और अब तक का नुकसान
पिछले 24 घंटों में अमेरिकी सेना ने ईरान में करीब 7,000 ठिकानों पर हमला करने का दावा किया है। इस संघर्ष के कारण दुबई और अन्य खाड़ी देशों के बुनियादी ढांचे पर भी असर पड़ा है। मौजूदा स्थिति और नुकसान के आंकड़े नीचे दिए गए हैं:
| विवरण | आंकड़े / स्थिति |
|---|---|
| कच्चे तेल की कीमत (Brent Crude) | 105 डॉलर प्रति बैरल |
| ईरान में मरने वालों की संख्या | लगभग 1,300 |
| अमेरिकी सैनिकों की मृत्यु | 13 सर्विस मेंबर्स |
| लेबनान में हताहत | 886 लोग |
| दुबई एयरपोर्ट की स्थिति | धीरे-धीरे संचालन शुरू |
| शिपिंग स्टेटस | ज्यादातर टैंकरों की आवाजाही बंद |
प्रवासियों और आम जनता पर क्या होगा असर?
होर्मुज जलडमरूमध्य के बंद होने से खाड़ी देशों में रहने वाले भारतीय प्रवासियों और दुनिया भर के उपभोक्ताओं के लिए मुश्किलें बढ़ सकती हैं। तेल की बढ़ती कीमतों के कारण आने वाले दिनों में पेट्रोल, डीजल और हवाई यात्रा के टिकट महंगे होने की संभावना है। यूरोपीय संघ अब संयुक्त राष्ट्र के साथ मिलकर एक सुरक्षित समुद्री गलियारा बनाने की कोशिश कर रहा है ताकि एशिया और अन्य हिस्सों में ईंधन और उर्वरक की सप्लाई सुनिश्चित की जा सके और वैश्विक खाद्य संकट को टाला जा सके।




