ईरान का बड़ा फैसला, परमाणु अप्रसार संधि NPT से बाहर निकलने पर हो रही है चर्चा
ईरान और पश्चिमी देशों के बीच बढ़ता तनाव अब एक नए मोड़ पर पहुंच गया है। ईरान ने आधिकारिक तौर पर घोषणा की है कि वह परमाणु अप्रसार संधि (NPT) से बाहर निकलने के विकल्प पर गंभीरता से विचार कर रहा है। ईरान के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता Ismail Baqaei और वहां की संसद के सदस्यों ने इस बात की पुष्टि की है कि इस मुद्दे पर उच्च स्तरीय चर्चा शुरू हो चुकी है। यह कदम ईरान के परमाणु ठिकानों पर हाल ही में हुए हमलों और बढ़ते सुरक्षा खतरों के जवाब में उठाया जा रहा है।
ईरान क्यों छोड़ना चाहता है परमाणु संधि?
ईरानी अधिकारियों का कहना है कि परमाणु अप्रसार संधि में बने रहने का अब उनके लिए कोई खास मतलब नहीं रह गया है। ईरान की संसद में नेशनल सिक्योरिटी और फॉरेन पॉलिसी कमेटी के सदस्य Alaa al-Din Boroujerdi ने कहा कि अमेरिका और इजरायल के कथित हमलों के बाद इस संधि में रहना बेकार है। ईरान का आरोप है कि International Atomic Energy Agency (IAEA) ने उनके ठिकानों पर हो रहे हमलों के खिलाफ कोई ठोस कदम नहीं उठाया है।
- ईरान का दावा है कि IAEA की निगरानी का इस्तेमाल जासूसी के लिए किया जा रहा है।
- परमाणु ठिकानों पर हमलों को ईरान अपनी संप्रभुता का उल्लंघन मानता है।
- रूस ने भी चेतावनी दी है कि परमाणु ठिकानों पर हमले से रेडिएशन का खतरा बढ़ सकता है।
- ईरान का कहना है कि संधि छोड़ने का मतलब परमाणु बम बनाना नहीं, बल्कि अपनी रक्षा करना है।
हाल के घटनाक्रम और महत्वपूर्ण तारीखें
मार्च 2026 के आखिरी हफ्ते में इस मामले ने काफी रफ्तार पकड़ी है। ईरान की सरकारी न्यूज़ एजेंसी Tasnim लगातार इस पर अपडेट दे रही है। इस फैसले के लिए केवल संसद ही काफी नहीं है, बल्कि इस पर ईरान की सुप्रीम नेशनल सिक्योरिटी काउंसिल की मुहर लगनी भी जरूरी होगी। नीचे दी गई टेबल में आप हाल के घटनाक्रम देख सकते हैं।
| तारीख (2026) | मुख्य घटनाक्रम |
|---|---|
| 27 मार्च | ईरानी नेशनल सिक्योरिटी कमेटी ने संधि को गैर-उत्पादक बताया। |
| 28 मार्च | रूस ने परमाणु साइटों पर हमलों को NPT के लिए खतरा बताया। |
| 29 मार्च | Tasnim एजेंसी ने बताया कि संधि छोड़ने पर गंभीरता से विचार हो रहा है। |
| 30 मार्च | विदेश मंत्रालय ने संसद में चल रही चर्चाओं की पुष्टि की। |
खाड़ी देशों और प्रवासियों पर क्या होगा इसका असर?
ईरान का यह कदम पूरे मिडिल ईस्ट क्षेत्र की सुरक्षा और स्थिरता के लिए महत्वपूर्ण है। सऊदी अरब, यूएई और कुवैत जैसे देशों में काम करने वाले लाखों भारतीय प्रवासियों के लिए इस क्षेत्र की शांति बहुत जरूरी है। अगर तनाव और अधिक बढ़ता है, तो इसका सीधा असर कच्चे तेल की कीमतों और खाड़ी देशों के आर्थिक माहौल पर पड़ सकता है। जानकारों का मानना है कि इस फैसले से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कूटनीतिक दबाव बढ़ेगा, जिससे खाड़ी में रहने वाले लोगों की यात्रा और व्यापारिक गतिविधियों पर भी प्रभाव पड़ सकता है।




