ईरान ने यूनेस्को से लगाई गुहार, इसराइल के हमले की चेतावनी के बाद ट्रांस-ईरानी रेलवे को बचाने की मांग.
ईरान और इसराइल के बीच बढ़ते तनाव के बीच अब ईरान ने अपनी ऐतिहासिक विरासत को बचाने के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपील की है। 7 अप्रैल 2026 को ईरान के सांस्कृतिक विरासत मंत्रालय ने यूनेस्को (UNESCO) को एक आधिकारिक पत्र लिखकर ट्रांस-ईरानी रेलवे पर संभावित खतरों की निंदा करने की मांग की। ईरान का कहना है कि यह रेलवे नेटवर्क केवल एक बुनियादी ढांचा नहीं है बल्कि पूरी मानवता की साझा विरासत है जिसे युद्ध की स्थिति में नुकसान नहीं पहुँचाना चाहिए।
ट्रांस-ईरानी रेलवे की खासियत और मौजूदा स्थिति
यह रेलवे लाइन ईरान की इंजीनियरिंग का एक बेमिसाल नमूना मानी जाती है। इसके बारे में कुछ मुख्य बातें इस प्रकार हैं:
- यह रेलवे लाइन 1,394 किलोमीटर लंबी है जो उत्तर-पूर्व में कैस्पियन सागर को दक्षिण-पश्चिम में फारस की खाड़ी से जोड़ती है।
- यूनेस्को ने साल 2021 में इसे इसके कठिन निर्माण और इंजीनियरिंग कौशल के लिए वर्ल्ड हेरिटेज साइट का दर्जा दिया था।
- इसका निर्माण कार्य साल 1927 में शुरू होकर 1938 में पूरा हुआ था।
- यह रेलवे लाइन ऊंचे पहाड़ों, गहरी खाइयों और तपते रेगिस्तानों के बीच से होकर गुजरती है।
क्या है ताजा विवाद और ईरान की अपील?
ईरान और इसराइल के बीच छिड़ी इस खींचतान में अब रेलवे जैसे सार्वजनिक परिवहन और विरासत स्थलों पर खतरे के बादल मंडरा रहे हैं। हालिया घटनाक्रम को लेकर ईरान ने कई महत्वपूर्ण बातें कही हैं:
| विषय | विवरण |
|---|---|
| इजरायली चेतावनी | 7 अप्रैल 2026 को IDF ने ईरानी नागरिकों को रेलवे बुनियादी ढांचे से दूर रहने की सलाह दी। |
| ट्रेन सेवाएं रद्द | चेतावनी के बाद मशहद शहर में ट्रेन सेवाओं को सुरक्षा कारणों से रोक दिया गया है। |
| ईरान का तर्क | ईरान का कहना है कि इस ऐतिहासिक स्थल पर हमला 1954 के हेग कन्वेंशन का उल्लंघन होगा। |
| यूनेस्को का रुख | यूनेस्को ने अभी तक ईरान की इस ताजा अपील पर कोई औपचारिक जवाब नहीं दिया है। |
| पुराना नुकसान | मार्च 2026 में यूनेस्को ने पुष्टि की थी कि तनाव के कारण ईरान की 4 अन्य वर्ल्ड हेरिटेज साइट्स को नुकसान पहुँचा है। |
ईरान के सांस्कृतिक विरासत मंत्री ने जोर देकर कहा है कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय को इन ऐतिहासिक खजानों की रक्षा के लिए अपनी जिम्मेदारी निभानी चाहिए। फिलहाल यूनेस्को पर इस मामले में एक स्पष्ट रुख अपनाने का दबाव लगातार बढ़ रहा है ताकि इन ऐतिहासिक धरोहरों को किसी भी सैन्य कार्रवाई से सुरक्षित रखा जा सके।




