मिडिल ईस्ट में तनाव के बीच फ्रांस का बड़ा फैसला, युद्धपोत Charles de Gaulle को समुद्र में उतरने का दिया आदेश
फ्रांसीसी राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रॉन ने 3 मार्च 2026 को अपने सबसे शक्तिशाली विमान वाहक पोत Charles de Gaulle को पूर्वी भूमध्य सागर में तैनात करने का आदेश दिया है। यह कदम मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव और हाल ही में हुए हमलों के बाद फ्रांस और उसके सहयोगियों के हितों की रक्षा के लिए उठाया गया है। यह युद्धपोत अगले 10 दिनों में अपनी लोकेशन पर पहुँच जाएगा। इस फैसले का सीधा असर खाड़ी देशों में रहने वाले प्रवासियों और वहां की सुरक्षा व्यवस्था पर पड़ेगा।
फ्रांस ने यह बड़ा कदम क्यों उठाया?
राष्ट्रपति मैक्रॉन ने अपने संबोधन में बताया कि साइप्रस में ब्रिटिश एयरबेस और संयुक्त अरब अमीरात (UAE) में एक फ्रांसीसी ठिकाने पर हुए ड्रोन हमलों की वजह से यह तैनाती की गई है। इस मिशन का मुख्य मकसद फ्रांस के रणनीतिक साझेदारों जैसे UAE, कतर, कुवैत और जॉर्डन की रक्षा करना है। फ्रांस ने साफ़ किया है कि उसकी सेनाएं आत्मरक्षा में कार्रवाई करने और व्यापारिक रास्तों को सुरक्षित रखने के लिए पूरी तरह स्वतंत्र होंगी।
इस मिशन में कौन-कौन से सैन्य साजो-सामान शामिल हैं?
फ्रांस ने इस मिशन के लिए अपनी सबसे मजबूत यूनिट को रवाना किया है। इसमें परमाणु शक्ति से चलने वाले विमान वाहक पोत के साथ कई आधुनिक जंगी जहाज शामिल हैं:
- विमान वाहक पोत: Charles de Gaulle (फ्रांसीसी नौसेना का प्रमुख जहाज)
- लड़ाकू विमान: 20 Rafale जेट और दो E-2C Hawkeye रडार विमान
- सहयोगी जहाज: Languedoc, Alsace, Chevalier Paul और इटली का जंगी जहाज Andrea Doria
- सप्लाई शिप: तेल पहुँचाने वाला जहाज Jacques Chevallier भी बेड़े का हिस्सा है
खाड़ी में रहने वाले भारतीयों और ग्लोबल मार्केट पर क्या होगा असर?
होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) और स्वेज नहर दुनिया के व्यापार के लिए बहुत जरूरी हैं, जहाँ से 20% तेल की सप्लाई होती है। तनाव की वजह से तेल और गैस की कीमतें बढ़ सकती हैं, जिसका सीधा असर आम आदमी की जेब पर पड़ेगा। यूएई, कतर और कुवैत में रहने वाले लाखों भारतीय प्रवासियों के लिए समुद्र की सुरक्षा और हवाई क्षेत्र का सुरक्षित रहना बहुत महत्वपूर्ण है। फ्रांस की इस पहल का मकसद इन इलाकों में व्यापार और आवाजाही को बिना किसी डर के बहाल रखना है।




