पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव और तेल-गैस की सप्लाई में आ रही दिक्कतों के बीच जर्मनी ने एक बड़ा बयान दिया है। भारत में जर्मनी के राजदूत फिलिप एकरमैन ने कहा है कि अब दुनिया को जीवाश्म ईंधन यानी पेट्रोल-डीजल और गैस पर अपनी निर्भरता पूरी तरह खत्म करनी होगी। उन्होंने नई दिल्ली में आयोजित क्लाइमेट टॉक के दौरान यह बात कही और भारत को रिन्यूएबल एनर्जी का एक बड़ा केंद्र बताया।
पश्चिम एशिया के संकट से क्यों बढ़ रही है चिंता?
पश्चिम एशिया में जारी तनाव के कारण हॉरमुज जलडमरूमध्य से होने वाली तेल और गैस की सप्लाई पर बार-बार बुरा असर पड़ रहा है। राजदूत फिलिप एकरमैन ने कहा कि इस तरह के संकटों की वजह से ईंधन के दाम तेजी से बढ़ते हैं, जिससे भारत और जर्मनी के आम लोगों पर भारी आर्थिक बोझ पड़ता है। इसीलिए अब समय आ गया है कि सभी देश मिलकर इसका सुरक्षित और टिकाऊ विकल्प ढूंढें।
भारत और जर्मनी मिलकर कैसे करेंगे काम?
जर्मनी ने भारत को ग्रीन एनर्जी के क्षेत्र में एक बड़ा केंद्र माना है। राजदूत ने कच्छ के रन में अडानी ग्रुप द्वारा चलाए जा रहे विशाल पवन और सौर ऊर्जा प्रोजेक्ट्स की काफी तारीफ की। दोनों देशों के बीच सहयोग को मजबूत करने के लिए जर्मनी हर साल 1.3 बिलियन यूरो की मदद दे रहा है। इसके साथ ही दोनों देशों ने ग्रीन हाइड्रोजन टास्क फोर्स को भी आगे बढ़ाया है ताकि आने वाले समय में पर्यावरण को सुरक्षित रखा जा सके।
क्या है जर्मनी का भविष्य को लेकर बड़ा लक्ष्य?
जर्मनी ने अपनी ऊर्जा नीतियों में बड़े बदलाव किए हैं और वह तेजी से कोयले और गैस से दूरी बना रहा है। जर्मनी का लक्ष्य साल 2045 तक पूरी तरह नेट-जीरो एमिशन यानी शून्य उत्सर्जन हासिल करना है। इसके अलावा साल 2030 तक जर्मनी अपनी 80 प्रतिशत बिजली रिन्यूएबल एनर्जी से बनाएगा और साल 2035 तक इसे 100 प्रतिशत करने का लक्ष्य रखा गया है।
Frequently Asked Questions (FAQs)
जर्मनी के राजदूत ने जीवाश्म ईंधन से आजादी की बात क्यों कही?
पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव और स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में तेल-गैस सप्लाई प्रभावित होने से ईंधन के दाम लगातार बढ़ रहे हैं, जिससे आम जनता पर बोझ बढ़ रहा है।
जर्मनी भारत की ग्रीन एनर्जी प्रोजेक्ट्स के लिए कितनी आर्थिक मदद दे रहा है?
जर्मनी हर साल भारत को जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को कम करने और ग्रीन एनर्जी प्रोजेक्ट्स के लिए 1.3 बिलियन यूरो की आर्थिक सहायता दे रहा है।