जर्मनी ने एक बड़ा फैसला लेते हुए अपना माइन स्वीपर जहाज ‘Fulda’ भूमध्य सागर की ओर भेज दिया है। यह कदम इसलिए उठाया गया है ताकि अगर जरूरत पड़े तो इस जहाज को हॉर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) में तैनात किया जा सके। यह पूरी तैयारी अमेरिका, इसराइल और ईरान के बीच चल रहे तनाव को देखते हुए की गई है।
जर्मनी के ‘Fulda’ जहाज का मिशन क्या है और यह कहां गया?
जर्मन रक्षा मंत्रालय के मुताबिक, माइन स्वीपर जहाज ‘Fulda’ ने 4 मई 2026 को Kiel-Wyk नेवल बेस से अपनी यात्रा शुरू की। फिलहाल यह जहाज भूमध्य सागर की ओर जा रहा है। इस मिशन के बारे में मुख्य बातें नीचे दी गई हैं:
- क्रू की संख्या: जहाज ‘Fulda’ पर करीब 45 सदस्य सवार हैं।
- शुरुआती काम: यह जहाज पहले भूमध्य सागर में नाटो (NATO) की माइन काउंटरमेजर्स यूनिट के साथ जुड़कर समुद्र में बारूदी सुरंगों की खोज करेगा।
- मंत्रालय का बयान: जर्मन रक्षा मंत्री बोरिस पिस्टोरियस ने बताया कि जर्मनी एक माइन स्वीपर के साथ-साथ कमांड और सपोर्ट शिप भी भेजेगा।
क्या यह जहाज हॉर्मुज जलडमरूमध्य में तैनात होगा और इसकी शर्तें क्या हैं?
जर्मनी ने साफ किया है कि यह जहाज अभी केवल ‘प्री-पोजीशनिंग’ के लिए भेजा गया है, यानी इसे ऑपरेशन वाले इलाके के करीब रखा जा रहा है। हॉर्मुज जलडमरूमध्य में इसकी असल तैनाती के लिए कुछ शर्तें पूरी होनी जरूरी हैं:
- शांति की शर्त: अमेरिका, इसराइल और ईरान के बीच चल रही लड़ाई का पूरी तरह से खत्म होना जरूरी है।
- संसद की मंजूरी: जहाज की तैनाती के लिए जर्मन संसद (Bundestag) की अनुमति लेनी होगी।
- कानूनी आधार: जर्मनी के चांसलर फ्रेडरिक मेर्ज़ ने कहा कि इस ऑपरेशन के लिए संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UN Security Council) जैसे किसी अंतरराष्ट्रीय संगठन का कानूनी फैसला जरूरी होगा।
इस पूरी कोशिश का मकसद अंतरराष्ट्रीय सहयोग के जरिए समुद्र में जहाजों के आने-जाने की आजादी (Freedom of Navigation) को सुरक्षित रखना है।
Frequently Asked Questions (FAQs)
जर्मनी ने माइन स्वीपर जहाज क्यों भेजा है?
जर्मनी ने यह जहाज भूमध्य सागर में इसलिए भेजा है ताकि जरूरत पड़ने पर इसे हॉर्मुज जलडमरूमध्य में तैनात किया जा सके और अंतरराष्ट्रीय जलमार्गों की सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके।
जहाज ‘Fulda’ की तैनाती के लिए क्या जरूरी है?
इसकी तैनाती के लिए जर्मन संसद की मंजूरी, अमेरिका-इसराइल-ईरान के बीच युद्ध का अंत और संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद का कानूनी आधार होना जरूरी है।