ईरान और इजरायल तनाव के बीच खाड़ी देशों में नौकरियों पर संकट, विशेषज्ञों ने आर्थिक गिरावट की दी चेतावनी
खाड़ी देशों में काम करने वाले लाखों भारतीय प्रवासियों के लिए आने वाला समय काफी चुनौतीपूर्ण हो सकता है। ईरान और इजरायल के बीच बढ़ते क्षेत्रीय तनाव के कारण कतर, कुवैत और यूएई जैसी बड़ी अर्थव्यवस्थाओं पर बुरा असर पड़ने की आशंका जताई गई है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि युद्ध की स्थिति लंबी खिंचती है, तो इसका सीधा असर वहां रह रहे प्रवासियों की नौकरियों और आय पर पड़ेगा। सोशल मीडिया पर चल रही भारी भर्ती की खबरों के उलट ज़मीनी हकीकत सुरक्षा और आर्थिक स्थिरता को लेकर चिंताजनक बनी हुई है।
युद्ध की स्थिति में अर्थव्यवस्था और नौकरियों पर क्या असर होगा?
क्षेत्रीय तनाव का सबसे बड़ा असर खाड़ी देशों की जीडीपी पर देखने को मिल सकता है। आर्थिक विशेषज्ञों ने इसके लिए कुछ मुख्य चेतावनियां जारी की हैं:
- होर्मुज जलडमरूमध्य में व्यवधान आने से कतर और कुवैत की जीडीपी में 14% तक की बड़ी गिरावट आ सकती है।
- सऊदी अरब की अर्थव्यवस्था में 3% और संयुक्त अरब अमीरात (UAE) में 5% की गिरावट का अनुमान है।
- यह 1990 के दशक के बाद का सबसे बड़ा आर्थिक संकट साबित हो सकता है जिससे वेतन वृद्धि रुक सकती है।
- नेपाल जैसे देशों ने सुरक्षा चिंताओं के कारण कुवैत, इराक और लेबनान जैसे देशों के लिए श्रम स्वीकृति को फिलहाल निलंबित कर दिया है।
यूएई के नए नियम और सुरक्षा के लिए किए गए इंतजाम
यूएई सरकार और भारत सरकार ने प्रवासियों के हितों की रक्षा के लिए कुछ महत्वपूर्ण कदम उठाए हैं। 14 मार्च 2026 को यूएई के मानव संसाधन मंत्रालय (MOHRE) ने श्रम बाजार की मजबूती की पुष्टि की है। कंपनियों को निर्देश दिया गया है कि वे परिस्थितियों के अनुसार सुरक्षा प्रोटोकॉल और रिमोट वर्क विकल्पों का उपयोग करें। भारत सरकार ने भी प्रवासी भारतीय बीमा योजना (PBBY) और न्यूनतम रेफरल वेतन के माध्यम से कामगारों के लिए सुरक्षा कवच तैयार किया है। बिना न्यूनतम वेतन कानून वाले देशों में $300 से $600 का मानक तय किया गया है ताकि किसी भी संकट की स्थिति में भारतीय श्रमिकों को आर्थिक नुकसान से बचाया जा सके।




