अंतरराष्ट्रीय अपराध न्यायालय पर अमेरिकी प्रतिबंध, प्रमुख टोमोको अकाने ने बताया न्यायिक स्वतंत्रता पर हमला

अंतरराष्ट्रीय मामलों में इस वक्त एक बड़ी और सनसनीखेज खबर सामने आ रही है जहां इंटरनेशनल क्रिमिनल कोर्ट यानी ICC की अध्यक्ष टोमोको अकाने ने अमेरिका द्वारा लगाए गए कड़े प्रतिबंधों पर अपनी कड़ी आपत्ति जताई है। अमेरिका ने हाल ही में अकाने और कोर्ट के एक अन्य वरिष्ठ अधिकारी पर पाबंदियां लगाई थीं जिसके बाद से अंतरराष्ट्रीय कानून के गलियारों में हलचल तेज हो गई है। अध्यक्ष अकाने ने चेतावनी देते हुए साफ कहा है कि इस तरह के कदमों से वैश्विक स्तर पर अंतरराष्ट्रीय कानून और न्याय देने वाली स्वतंत्र संस्थाओं का वजूद कमजोर हो सकता है। यह पूरा मामला ऐसे वक्त में गरमाया है जब दुनिया के कई बड़े देश न्यायपालिका के अधिकारों और अपनी संप्रभुता को लेकर आमने-सामने आ चुके हैं।
अमेरिका और आईसीसी के बीच क्यों बढ़ा तनाव
रूस के अंतरराष्ट्रीय समाचार नेटवर्क रशिया टुडे से मिली जानकारी के मुताबिक अमेरिका ने बीते मंगलवार को ICC की अध्यक्ष टोमोको अकाने और कोर्ट के वरिष्ठ ट्रायल वकील अब्दौलाये सेये के ऊपर पाबंदियां थोप दी थीं। अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने इस अदालत को खुले तौर पर भ्रष्ट और राजनीतिक रूप से प्रेरित संस्था करार दिया था। अमेरिकी प्रशासन का यह भी कहना था कि यह कोर्ट अपने तय अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर काम कर रही है। हालांकि जापानी प्रकाशक बुंगेई शुनजू की सोशल मीडिया पोस्ट में छपी टिप्पणी के मुताबिक अकाने का कहना था कि उन्हें इस तरह के एक्शन की आशंका पहले से ही थी। उन्होंने इस बात पर सबसे ज्यादा जोर दिया कि इन प्रशासनिक कदमों को अंतरराष्ट्रीय कानून के शासन के खात्मे की शुरुआत नहीं बनने देना चाहिए।
रोम स्टैच्यू और दुनिया भर के देशों की स्थिति
आपकी जानकारी के लिए बता दें कि इस अदालत की स्थापना साल 2002 में रोम स्टैच्यू के तहत की गई थी जिसका मुख्य उद्देश्य नरसंहार, युद्ध अपराध और मानवता के खिलाफ होने वाले गंभीर अपराधों की सुनवाई करना है। वर्तमान समय में दुनिया भर के कुल 123 देश इस संस्था के सदस्य बने हुए हैं। लेकिन सबसे खास बात यह है कि अमेरिका, रूस, चीन और भारत जैसे दुनिया के कई ताकतवर और प्रमुख देशों ने या तो इस समझौते पर हस्ताक्षर ही नहीं किए हैं या फिर इसकी आधिकारिक पुष्टि नहीं की है। वॉशिंगटन का आरोप है कि यह कोर्ट ऐसे देशों के नागरिकों को निशाना बना रही है जिन्होंने कभी भी इसके अधिकार क्षेत्र को स्वीकार नहीं किया है और न ही रोम स्टैच्यू को मंजूरी दी है।
विवादित मामलों का इतिहास और दुनिया भर की प्रतिक्रिया
इससे पहले भी इस अदालत ने अफगानिस्तान में अमेरिकी सैन्य और खुफिया एजेंसियों के लोगों पर कथित अपराधों की जांच की थी जबकि अमेरिका खुद इस कोर्ट का सदस्य नहीं है। इसके अलावा मध्य पूर्व में चल रहे संघर्ष के बीच साल 2024 में कोर्ट ने गाजा में कथित युद्ध अपराधों के मामले में इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू और पूर्व रक्षा मंत्री योव गैलेंट के खिलाफ गिरफ्तारी वारंट जारी किए थे। इसके बाद साल 2025 के फरवरी महीने में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इन वारंटों की खुलकर निंदा करते हुए एक कार्यकारी आदेश पर हस्ताक्षर किए थे। केवल अमेरिका ही नहीं बल्कि अफ्रीका महाद्वीप के कुछ देशों जैसे बुर्किना फासो, माली, नाइजर और चाड ने भी हाल ही में इस अदालत से अलग होने की प्रक्रिया शुरू कर दी है क्योंकि इन देशों का आरोप है कि कोर्ट अफ्रीकी देशों को ही unfairly निशाना बनाती है। इसके अलावा फिलीपींस साल 2019 में इससे बाहर हो चुका है लेकिन पुराने मामलों के तहत मार्च 2025 में पूर्व राष्ट्रपति रोड्रिगो दुतेर्ते को वारंट के आधार पर गिरफ्तार कर हेग भेजा गया था। वहीं दूसरी तरफ रूस भी इसके अधिकार क्षेत्र को नहीं मानता है और मार्च 2023 में रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन तथा बच्चों की कमिश्नर मारिया ल्वोवा-बेलोवा के खिलाफ जारी वारंट को मॉस्को ने पूरी तरह खारिज कर दिया था।