भारत और ईरान के बीच व्यापारिक रिश्तों में एक बड़ी नई शुरुआत होने वाली है। ईरान के राजदूत डॉ. मोहम्मद फताली ने उम्मीद जताई है कि प्रतिबंध हटने के बाद ईरान फिर से भारत को तेल सप्लाई करने वाले मुख्य देशों में शामिल हो जाएगा। इससे दोनों देशों के बीच व्यापार पहले के रिकॉर्ड को पार कर सकता है।
ANI के साथ एक खास बातचीत में राजदूत फताली ने बताया कि प्रतिबंध लगने से पहले ईरान भारत को कच्चे तेल की सप्लाई करने वाले टॉप तीन देशों में शामिल रहता था। उस समय दोनों देशों के बीच सालाना व्यापार 17 बिलियन अमेरिकी डॉलर से भी ज़्यादा था। उन्होंने कहा कि भारत को सस्ती और भरोसेमंद ऊर्जा की ज़रूरत है और ईरान इसे पूरा करने की पूरी क्षमता रखता है।
इस पूरे मामले में सबसे बड़ी खबर अमेरिका और ईरान के बीच आई है। दोनों देशों ने आपसी विवाद और संघर्ष को खत्म करने के लिए एक समझौते (MoU) पर इलेक्ट्रॉनिक हस्ताक्षर किए हैं। इस समझौते पर औपचारिक रूप से 19 जून 2026 को स्विट्जरलैंड में साइन होने की उम्मीद है। अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने इस डील की पुष्टि की और इसे क्षेत्रीय स्थिरता के लिए एक बड़ा कदम बताया।
समझौते की मुख्य बातें
| विवरण | जानकारी |
|---|---|
| पिछला व्यापार स्तर | 17 बिलियन अमेरिकी डॉलर से अधिक |
| औपचारिक हस्ताक्षर की तारीख | 19 जून 2026 |
| होर्मुज जलडमरूमध्य का खुलना | 30 दिनों के भीतर |
| आर्थिक विकास फंड | 300 बिलियन डॉलर |
| युद्धविराम की अवधि | 60 दिन |
| हस्ताक्षर स्थल | स्विट्जरलैंड |
लीक हुई जानकारी के मुताबिक, इस समझौते के तहत होर्मुज जलडमरूमध्य को 30 दिनों के भीतर पूरी तरह खोल दिया जाएगा, जिसकी जिम्मेदारी ईरान की होगी। साथ ही, ईरान के परमाणु कार्यक्रम और जमी हुई संपत्तियों को छोड़ने पर बातचीत शुरू होगी। ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी और इटली (E4 देश) ने भी इस समझौते का स्वागत किया है और कहा है कि परमाणु कार्यक्रम पर ठोस कदम दिखने के बाद वे प्रतिबंध हटा देंगे।
ईरान के डिप्टी विदेश मंत्री काज़िम गरिबादी ने बताया कि 60 दिनों के युद्धविराम के दौरान प्रतिबंधों में राहत और अन्य बड़े मुद्दों पर बातचीत होगी। वहीं, इसराइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने इस डील को लेकर कुछ चिंताएं जताई हैं, खासकर लेबनान में मौजूद इसराइली सैनिकों की स्थिति को लेकर।
राजदूत फताली ने साफ़ किया कि भारत के साथ व्यापार फिर से बढ़ाने के लिए बातचीत और समझौतों की ज़रूरत होगी, ताकि आने वाले समय में तेल की सप्लाई को स्थिर रखा जा सके।