पश्चिम एशिया संकट और होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) के बंद होने के बाद जहां पूरी दुनिया में पेट्रोल और डीजल की कीमतों में भारी उछाल आया है, वहीं भारत में इसका असर बहुत कम देखने को मिला है। वैश्विक स्तर पर कच्चे तेल की कीमतें लगभग दोगुनी होने के बावजूद भारत में ईंधन की खुदरा कीमतों में केवल 5 प्रतिशत के आसपास की मामूली बढ़ोतरी दर्ज की गई है। सरकार और तेल कंपनियों ने मिलकर इस संकट के समय आम जनता को बड़े झटके से बचाए रखा है।

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भारत में कब और कितना बढ़ा पेट्रोल और डीजल का दाम?

जनवरी 2026 में कच्चे तेल की कीमत लगभग 63 डॉलर प्रति बैरल थी, जो अप्रैल 2026 तक बढ़कर औसतन 116 डॉलर प्रति बैरल हो गई थी। इसके बावजूद, भारत की सरकारी तेल कंपनियों जैसे Indian Oil Corporation Limited, Bharat Petroleum Corporation Limited और Hindustan Petroleum Corporation Limited ने फरवरी से लेकर 15 मई 2026 तक पेट्रोल और डीजल के दामों में कोई बदलाव नहीं किया।

इसके बाद 15 मई, 19 मई और 23 मई 2026 को तीन बार में कुल मिलाकर लगभग 5 प्रतिशत की बढ़ोतरी की गई। इस बदलाव से पेट्रोल की खुदरा कीमत में करीब 4.74 रुपये प्रति लीटर और डीजल की कीमत में करीब 4.82 रुपये प्रति लीटर की वृद्धि दर्ज की गई। अन्य देशों की तुलना में भारत में यह बढ़ोतरी बेहद कम रही है।

मंत्रालयों और अधिकारियों ने क्या दी जानकारी?

पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्रालय की संयुक्त सचिव सुजाता शर्मा ने 21 अप्रैल 2026 को जानकारी दी थी कि कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों के बाद भी भारत में घरेलू ईंधन की आपूर्ति पूरी तरह सामान्य और स्थिर बनी हुई है। इसके बाद केंद्रीय पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्री हरदीप सिंह पुरी ने 2 मई 2026 को बताया था कि सरकार ने बेहतर योजना बनाकर उपभोक्ताओं को वैश्विक झटके से सुरक्षित रखा है। उन्होंने बताया कि सरकारी तेल कंपनियां रोजाना लगभग 1,000 करोड़ रुपये का नुकसान उठा रही थीं, लेकिन उन्होंने फरवरी से अप्रैल के अंत तक कीमतें नहीं बढ़ने दीं।

आरबीआई गवर्नर संजय मल्होत्रा ने 13 और 14 मई 2026 को आगाह किया था कि अगर पश्चिम एशिया का संकट और होर्मुज का रास्ता बंद रहता है, तो सरकार को धीरे-धीरे इसका कुछ बोझ ग्राहकों पर डालना पड़ सकता है क्योंकि महंगे आयात से देश की अर्थव्यवस्था और रुपये पर असर पड़ना शुरू हो गया था। इसी बीच, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 22 मई 2026 को सभी केंद्रीय मंत्रियों को निर्देश दिया कि वे जनता के बीच जाकर ईंधन की बढ़ती कीमतों के सही कारणों और पश्चिम एशिया संकट के असर को समझाएं।

बढ़ते तेल संकट के बीच क्या आ रहे हैं बड़े बदलाव?

उद्योग संगठन भारतीय उद्योग परिसंघ (CII) ने 21 मई 2026 को देश में ईंधन, खाद और खाद्य सामग्री यानी ‘3Fs’ की कीमतों से निपटने के लिए एक मजबूत राष्ट्रीय रणनीति बनाने की मांग की है। उन्होंने देश में इथेनॉल मिश्रण बढ़ाने, फ्लेक्स-फ्यूल वाहनों को बढ़ावा देने और घरेलू तेल-गैस खोज तेज करने की सिफारिश की है।

पश्चिम एशिया के तनाव और कच्चे तेल की कीमतों में अस्थिरता के कारण भारत में इलेक्ट्रिक वाहनों (EV) की मांग में भी तेजी देखी जा रही है। विशेष रूप से कमर्शियल और फ्लीट मोबिलिटी में लोग अब ईवी को अधिक पसंद कर रहे हैं ताकि रोजाना के संचालन खर्च को स्थिर और नियंत्रित रखा जा सके।

Frequently Asked Questions (FAQs)

पश्चिम एशिया संकट के बीच भारत में पेट्रोल-डीजल के दाम कितने बढ़े हैं?

वैश्विक स्तर पर कच्चे तेल की कीमतें करीब दोगुनी होने के बावजूद भारत में ईंधन के दामों में सिर्फ 5% की बढ़ोतरी हुई है। यह बढ़ोतरी मई 2026 में की गई, जिससे पेट्रोल करीब 4.74 रुपये और डीजल करीब 4.82 रुपये प्रति लीटर महंगा हुआ।

तेल कंपनियों को इस दौरान कितना नुकसान उठाना पड़ा?

केंद्रीय मंत्री हरदीप सिंह पुरी के अनुसार, आम जनता को महंगे ईंधन से बचाने के लिए सरकारी तेल कंपनियों ने कीमतों को स्थिर रखा, जिसके कारण उन्हें रोजाना करीब 1,000 करोड़ रुपये का नुकसान उठाना पड़ रहा था।