मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव और कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों के कारण भारतीय रुपया अपने अब तक के सबसे निचले स्तर पर पहुंच गया है। इस हफ्ते रुपये ने अमेरिकी डॉलर के मुकाबले पहली बार 94 का आंकड़ा पार किया, जो पिछले चार सालों में सबसे बड़ी गिरावट है। ईरान और अमेरिका के बीच जारी तनाव के कारण अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतें आसमान छू रही हैं, जिसका सीधा असर भारत की अर्थव्यवस्था और विदेशी मुद्रा भंडार पर पड़ रहा है।

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रुपये की इस रिकॉर्ड गिरावट के मुख्य कारण क्या हैं?

बाजार विशेषज्ञों के मुताबिक, 28 फरवरी 2026 से शुरू हुए ईरान संघर्ष के बाद से रुपये में गिरावट तेज हुई है। 23 मार्च 2026 को रुपया 94.40 के नए रिकॉर्ड निचले स्तर पर पहुंच गया था। इसके पीछे कई बड़े कारण बताए जा रहे हैं:

  • मिडिल ईस्ट में तनाव: ईरान और अमेरिका के बीच बढ़ते विवाद से सप्लाई चेन प्रभावित हुई है।
  • कच्चे तेल की कीमतें: इस महीने कच्चे तेल की कीमतों में 50% से अधिक की बढ़ोतरी हुई है, जिससे Brent crude 104 डॉलर प्रति बैरल के करीब पहुंच गया है।
  • विदेशी निवेशकों की निकासी: भारतीय शेयर बाजार से Foreign Institutional Investors (FIIs) लगातार अपना पैसा निकाल रहे हैं।
  • डॉलर की भारी मांग: तेल कंपनियों और आयातकों की ओर से डॉलर की मांग बहुत ज्यादा बढ़ गई है।

आम आदमी और खाड़ी देशों के प्रवासियों पर क्या असर होगा?

रुपये की कमजोरी का असर भारत में रहने वाले लोगों और विदेश में काम करने वाले प्रवासियों दोनों पर अलग-अलग तरह से पड़ेगा। खाड़ी देशों में रहने वाले भारतीय कामगारों के लिए अच्छी खबर यह है कि उन्हें अब घर पैसे भेजने पर पहले के मुकाबले ज्यादा रुपये मिलेंगे। वहीं दूसरी तरफ, भारत में आयात महंगा होने से महंगाई बढ़ने का खतरा भी बना हुआ है।

तारीख रुपये की स्थिति (प्रति डॉलर)
21 मार्च 2026 पहली बार 94 का स्तर छुआ
23 मार्च 2026 94.40 का नया रिकॉर्ड स्तर
24 मार्च 2026 93.71 पर मामूली सुधार

Finrex Treasury Advisors के मुताबिक, Reserve Bank of India (RBI) बाजार में सक्रिय है और रुपये की गिरावट को थामने की कोशिश कर रहा है। जानकारों का कहना है कि अगर मिडिल ईस्ट में तनाव कम नहीं हुआ, तो आने वाले दिनों में रुपया 94.50 से 95 के स्तर तक भी जा सकता है। फिलहाल बाजार की नजरें अमेरिका और ईरान के बीच होने वाली कूटनीतिक बातचीत पर टिकी हैं।