ईरान और अमेरिका के बीच तनाव एक बार फिर बढ़ गया है। ईरान ने आरोप लगाया है कि अमेरिका और इसराइल द्वारा किए गए हमलों में कुछ दूसरे देशों ने भी मदद की है। ईरान के विदेश मंत्रालय का कहना है कि ये देश तकनीकी और लॉजिस्टिक सपोर्ट देकर इस गैरकानूनी युद्ध में शामिल थे।

ईरान के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता Esmaeil Baghaei ने कहा कि अमेरिका ने ईरान की तटीय निगरानी सुविधाओं पर हवाई हमले किए हैं। उन्होंने इसे अंतरराष्ट्रीय कानूनों और UN चार्टर का बड़ा उल्लंघन बताया। ईरान ने यह भी कहा कि उसकी सेना ने अमेरिकी ठिकानों पर जवाबी हमले किए हैं और वह अपनी रक्षा करने का पूरा हक रखता है।

NATO देशों पर लगे आरोप

ईरान ने सीधे तौर पर NATO सदस्य देशों, खासकर इटली और रोमानिया पर उंगली उठाई है। NATO के महासचिव Mark Rutte ने एक इंटरव्यू में बताया था कि इटली के बेस से सैकड़ों अमेरिकी विमान उड़ान भर चुके हैं और रोमानिया ने अमेरिकी सैन्य अभियानों की मदद के लिए कमर्शियल फ्लाइट्स पर रोक लगाई थी। ईरान ने इसे युद्ध में सीधी मिलीभगत बताया है।

दूसरी तरफ, इटली के रक्षा मंत्रालय ने इन आरोपों को नकारा है। इटली ने साफ किया कि उसने हमलों की अनुमति नहीं दी, बल्कि सिर्फ मौजूदा समझौतों के तहत तकनीकी और लॉजिस्टिक उड़ानों की इजाज़त दी थी।

अमेरिका और अन्य देशों का क्या कहना है

  • US CENTCOM: अमेरिका ने पुष्टि की कि उसने 26 जून को ईरान पर हमले किए, क्योंकि ईरान ने हॉर्मुज़ जलडमरूमध्य में एक कमर्शियल जहाज M/V Ever Lovely पर ड्रोन हमला किया था।
  • Donald Trump: अमेरिकी राष्ट्रपति ने कहा कि ईरान ने पहले युद्धविराम का उल्लंघन किया है और NATO साथियों ने इस लड़ाई में पर्याप्त मदद नहीं की।
  • JD Vance: अमेरिकी उपराष्ट्रपति ने चेतावनी दी कि अगर ईरान ने फिर से हमला किया, तो उसका जवाब हिंसा से ही दिया जाएगा।

खाड़ी देशों की स्थिति

इस बीच बहरीन के विदेश मंत्रालय ने दावा किया कि ईरान के ड्रोन ने उनके इलाके को निशाना बनाया। कुवैत ने भी इस हमले की निंदा की और बहरीन के साथ खड़े होने की बात कही। ईरान ने खाड़ी देशों को चेतावनी दी है कि वे अपने इलाके और सुविधाओं का इस्तेमाल किसी भी हमलावर देश को न करने दें।

वहीं, 26 जून को इसराइल और लेबनान ने अमेरिका की मदद से एक ढांचागत समझौता किया है, जिससे भविष्य में दक्षिण लेबनान से इसराइली सेना की पूरी वापसी का रास्ता खुलेगा।