8 जुलाई 2026 को ईरान ने कुवैत और बहरीन में अमेरिकी सैन्य ठिकानों पर मिसाइल और ड्रोन से हमला किया। इस घटना के बाद GCC देशों ने अपनी सुरक्षा को लेकर चिंता जताई है। यह 1990 में कुवैत पर हुए हमले के बाद पहली बार है जब किसी बाहरी देश ने GCC की जमीन पर हमला किया।
GCC Ministerial Council ने एक खास बैठक बुलाकर इन हमलों को “आतंकी हमला” बताया। काउंसिल ने कहा कि यह नागरिकों और निवासियों की सुरक्षा और स्थिरता के लिए सीधा खतरा है। उन्होंने भरोसा दिया कि सदस्य देश अपनी सुरक्षा के लिए सभी जरूरी कदम उठाएंगे।
9 जुलाई को UN Security Council की इमरजेंसी बैठक हुई। इसमें इस हमले की कड़ी निंदा की गई, लेकिन कोई ठोस कार्रवाई करने का फैसला नहीं लिया गया।
सामूहिक सैन्य कार्रवाई नहीं हुई
बयानों में सख्ती होने के बावजूद, GCC देशों ने मिलकर कोई सैन्य कार्रवाई नहीं की। दिसंबर 2025 के ‘Sakhir Declaration’ में यह तय हुआ था कि किसी एक देश की संप्रभुता का उल्लंघन सबके लिए खतरा माना जाएगा। इसके बावजूद, इस हमले के बाद कोई सैन्य हलचल नहीं दिखी और ‘Peninsula Shield Force’ को भी सक्रिय नहीं किया गया।
कुवैत के एयर डिफेंस सिस्टम ने अपनी तरफ से मिसाइलों को रोका। इससे यह बात सामने आई कि GCC का सुरक्षा सिस्टम NATO के आर्टिकल 5 जैसा नहीं है, जहाँ एक पर हमला सब पर हमला माना जाता है।
अधिकारियों का बयान
GCC महासचिव Jasem Mohamed Albudaiwi ने ईरान की इस हरकत को अंतरराष्ट्रीय कानून का उल्लंघन और खुला हमला बताया। उन्होंने बहरीन और कुवैत के साथ अपनी एकजुटता जताई।
बहरीन ने मांग की है कि युद्ध को तुरंत रोका जाए और बातचीत को प्राथमिकता दी जाए। फिलहाल GCC और ईरान के बीच एक नॉन-अग्रेसन पैक्ट (non-aggression pact) पर चर्चा चल रही है ताकि क्षेत्र में तनाव को कम किया जा सके।
