अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव ने अब खाने-पीने की चीजों की सप्लाई पर असर डालना शुरू कर दिया है. अमेरिकी दबाव और बंदरगाहों पर सख्ती को देखते हुए ईरान ने अब अपना रास्ता बदल लिया है. अब जरूरी सामान लाने के लिए Caspian Sea का इस्तेमाल किया जा रहा है ताकि देश में खाद्य सुरक्षा बनी रहे और सामान की कमी न हो.

ईरान ने क्यों बदला अपना रास्ता और रूस की क्या है भूमिका

ईरान के बंदरगाहों पर अमेरिका काफी दबाव बना रहा है, जिससे सामान आने-जाने में दिक्कत हो रही है. इस वजह से ईरान अब रूस की मदद ले रहा है. 2026 की पहली तिमाही में रूस ने कैस्पियन सागर के जरिए ईरान को 5 लाख मीट्रिक टन जौ, 1.8 लाख मीट्रिक टन मक्का और 4 हजार टन से ज्यादा खाद्य-ग्रेड गेहूं भेजा है. अस्त्रखान क्षेत्र से होने वाले अनाज के शिपमेंट में 61 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है, जिसमें ईरान रूसी गेहूं का तीसरा सबसे बड़ा खरीदार बनकर उभरा है.

भारत के व्यापारियों और किसानों पर क्या होगा असर

ईरान और अमेरिका के बीच चल रही इस खींचतान का सीधा असर भारतीय व्यापारियों पर पड़ रहा है. खासकर सूखे मेवों (Dry Fruits) के कारोबारियों का माल समुद्र में फंस गया है, जिससे उन पर आर्थिक दबाव बढ़ गया है. इसके अलावा, समुद्री रास्तों में रुकावट और शिपिंग लागत बढ़ने से बासमती चावल के निर्यात में भी चुनौतियां आ रही हैं, जिससे भारतीय किसानों और निर्यातकों को नुकसान उठाना पड़ रहा है.

ईरानी सरकार और अधिकारियों ने क्या कहा

  • कृषि मंत्री: उन्होंने 22 अप्रैल 2026 को बताया कि अमेरिकी नौसैनिक नाकाबंदी का खाद्य आपूर्ति पर बहुत कम असर पड़ा है और देश घरेलू उत्पादन और वैकल्पिक रास्तों पर जोर दे रहा है.
  • मोहम्मद रजा मोर्तजावी (फूड इंडस्ट्रीज एसोसिएशन): उन्होंने कहा कि फिलहाल खाद्य सुरक्षा में कोई समस्या नहीं है, लेकिन भविष्य के लिए सावधानी से योजना बनानी होगी.
  • मोहम्मद बागेर गालिबाफ (संसद अध्यक्ष): उन्होंने साफ कहा कि अमेरिका और इजराइल धमकियों से अपनी बात नहीं मनवा सकते और नौसैनिक नाकाबंदी खत्म होना जरूरी है.