ईरान ने अपने उन परमाणु केंद्रों में विदेशी निरीक्षकों के जाने पर रोक लगा दी है जहाँ हमले हुए थे। ईरान के डिप्टी फॉरेन मिनिस्टर काजम गरिबाबादी ने साफ़ कर दिया है कि जब तक कोई आखिरी और पूरा समझौता नहीं हो जाता, तब तक इन जगहों पर किसी को नहीं आने दिया जाएगा। ईरान की इस शर्त ने अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (IAEA) के साथ तनाव बढ़ा दिया है।
गरिबाबादी ने बताया कि अभी परमाणु केंद्रों या वहां मौजूद मटेरियल की जांच के लिए कोई योजना नहीं है। उन्होंने यह भी कहा कि स्विट्जरलैंड में IAEA चीफ राफेल ग्रॉसी के साथ उनकी कोई मीटिंग नहीं हुई। ईरान का कहना है कि जब दूसरे देश प्रतिबंध (sanctions) हटाने के लिए ठोस कदम उठाएंगे, तभी इन मुद्दों को सुलझाया जा सकता है। ईरान के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता इस्माइल बक़ाई ने भी बमबारी वाली जगहों पर IAEA की एंट्री की खबरों को गलत बताया है।
वहीं दूसरी तरफ, IAEA चीफ राफेल ग्रॉसी का दावा है कि ईरान और अमेरिका के बीच हुए एक नए समझौते (MoU) के तहत जांच ज़रूर होगी। ग्रॉसी ने कहा कि यह समझौता IAEA को परमाणु गतिविधियों की निगरानी का अधिकार देता है और यह काम होकर रहेगा। ईरान ने ग्रॉसी की इन बातों को सिरे से खारिज कर दिया है और कहा है कि मीडिया के ज़रिए दबाव बनाने की कोशिश की जा रही है।
असल में, 2025 में हुए 12 दिन के युद्ध के बाद से IAEA को ईरान के यूरेनियम संवर्धन केंद्रों (enrichment sites) में जाने से रोका गया है। इसकी वजह से एजेंसी यह पता नहीं लगा पा रही है कि ईरान के पास कितना यूरेनियम स्टॉक है और वहां की मशीनें (centrifuges) किस स्थिति में हैं। इसके अलावा, इसफहान में बने एक नए भूमिगत केंद्र की भी अब तक जांच नहीं हो पाई है।
अमेरिका और ईरान के बीच एक समझौता (MoU) हुआ है, जिसमें ये बातें शामिल हैं:
- ईरान अपने अत्यधिक संवर्धित यूरेनियम स्टॉक को कम करेगा।
- अमेरिका ईरानी तेल पर लगे प्रतिबंधों में ढील देगा।
- इस MoU के तहत फाइनल डील के लिए 60 दिन का समय तय किया गया है।
स्विट्जरलैंड में हुई बातचीत के बाद अमेरिकी उपराष्ट्रपति JD Vance ने दावा किया कि ईरान परमाणु मॉनिटर्स को अनुमति देने के लिए राजी हो गया है। लेकिन ईरान के विदेश मंत्रालय ने इस बात को गलत बताया और कहा कि 18 घंटे चली इस बातचीत में परमाणु मुद्दों पर कोई बात नहीं हुई।
अब अगले हफ्ते स्विट्जरलैंड में फिर से तकनीकी स्तर की बातचीत शुरू होगी। इस पूरी प्रक्रिया में पाकिस्तान एक अहम मध्यस्थ (mediator) के तौर पर काम कर रहा है।
