मिडल ईस्ट में परमाणु हथियारों की होड़ ने एक बार फिर दुनिया की चिंता बढ़ा दी है। एक तरफ ईरान पर सख्त पाबंदियां हैं, तो दूसरी तरफ इसराइल की परमाणु ताकत को दुनिया चुपचाप स्वीकार करती है। अब अमेरिका और ईरान के बीच एक नया समझौता हुआ है ताकि इलाके में बढ़ते तनाव को कम किया जा सके और युद्ध की स्थिति को टाला जा सके।
IAEA ने जताई गंभीर चिंता
इंटरनेशनल एटॉमिक एनर्जी एजेंसी (IAEA) के बोर्ड ऑफ गवर्नर्स ने 10 जून 2026 को एक प्रस्ताव पास किया। इसमें कहा गया कि ईरान ने परमाणु जांच के नियमों का सही से पालन नहीं किया है। एजेंसी ने इस बात पर गहरा दुख जताया कि वह पिछले एक साल से ईरान में मौजूद हाई-एनरिच्ड यूरेनियम की जांच नहीं कर पाई है।
रिपोर्ट के मुताबिक, जून 2025 से ईरान के कई परमाणु ठिकानों पर निगरानी बंद हो गई थी। IAEA के डायरेक्टर जनरल रफ़ाएल ग्रोसी ने बताया कि ईरान ने अब तक उन सवालों के जवाब नहीं दिए हैं जो जून 2025 की रिपोर्ट में पूछे गए थे। एजेंसी के पास अब इस बात की जानकारी नहीं है कि ईरान के पास कितना यूरेनियम है और वह कहां रखा है।
अमेरिका और ईरान के बीच हुआ समझौता
तनाव के बीच 17 जून 2026 को अमेरिका और ईरान ने एक 14 पॉइंट का समझौता (MoU) साइन किया। इस समझौते के तहत दोनों देशों ने तय किया कि वे सैन्य कार्रवाई बंद करेंगे और अगले 60 दिनों तक परमाणु मुद्दों पर बातचीत करेंगे। ईरान ने एक बार फिर यह भरोसा दिलाया कि वह परमाणु हथियार नहीं बनाएगा।
बयानों में विरोधाभास और खींचतान
इस समझौते को लेकर अब उलझन बढ़ गई है। IAEA प्रमुख रफ़ाएल ग्रोसी ने 26 जून को कहा कि इस शांति समझौते के बाद यूएन के निरीक्षकों को ईरान जाने की अनुमति मिल गई है और तकनीकी बातचीत शुरू हो गई है।
लेकिन ईरान के डिप्टी विदेश मंत्री काज़ेम ग़रीबाबादी ने इस बात का खंडन किया। उन्होंने साफ़ कहा कि जब तक वाशिंगटन के साथ अंतिम डील नहीं हो जाती और ईरान पर लगे प्रतिबंध नहीं हटते, तब तक हमला किए गए परमाणु केंद्रों या सामग्री तक किसी को एक्सेस नहीं दिया जाएगा।
दुनिया की नज़र और आगे की राह
- अमेरिका का दबाव: अमेरिका चाहता है कि ईरान अपने यूरेनियम के स्टॉक को कम करे या उसे देश से बाहर भेजे।
- UN की चेतावनी: संयुक्त राष्ट्र के महासचिव एंटोनियो गुटेरेस ने 10 जून को चेतावनी दी कि मिडल ईस्ट गहरा संकट में जा रहा है और परमाणु मुद्दों पर गंभीर बातचीत जरूरी है।
- सैन्य विकल्प: अमेरिका ने साफ़ किया है कि अगर बातचीत फेल होती है, तो सैन्य कार्रवाई का विकल्प अभी भी खुला है।
वहीं दूसरी ओर, इसराइल की परमाणु नीति पर दुनिया चुप है। इसराइल ने कभी यह नहीं माना कि उसके पास परमाणु हथियार हैं और वह परमाणु अप्रसार संधि (NPT) का हिस्सा भी नहीं है, लेकिन दुनिया की बड़ी ताकतें उसकी इस स्थिति को स्वीकार करती हैं। इसी वजह से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इसे एकतरफा रवैया माना जा रहा है।
