ईरान और अमेरिका के बीच तनाव कम होने का नाम नहीं ले रहा है। हाल ही में ईरान ने अमेरिका द्वारा भेजे गए 48 घंटे के युद्धविराम यानी सीजफायर के प्रस्ताव को साफ तौर पर ठुकरा दिया है। यह प्रस्ताव एक पड़ोसी देश के जरिए भेजा गया था, लेकिन ईरान का कहना है कि उसे थोड़े समय की शांति नहीं बल्कि युद्ध का पूरी तरह खात्मा चाहिए। इस फैसले के बाद खाड़ी देशों में रहने वाले लोगों, खासकर भारतीय प्रवासियों के बीच सुरक्षा को लेकर चिंता फिर से बढ़ गई है क्योंकि तनाव बढ़ने का असर सीधा उनके कामकाज पर पड़ सकता है।

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ईरान ने क्यों ठुकराया सीजफायर का यह प्रस्ताव?

ईरान की आधिकारिक न्यूज एजेंसी के मुताबिक, सरकार का मानना है कि 48 घंटे का छोटा सीजफायर केवल अमेरिका और इसराइल को अपनी ताकत दोबारा जुटाने का मौका देगा। ईरान का कहना है कि वह लिखित जवाब देने के बजाय अपनी कार्रवाई के जरिए जमीन पर जवाब दे रहा है। वहां के राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन ने साफ किया है कि जब तक हमला पूरी तरह बंद नहीं होता, तब तक ऐसी किसी भी बातचीत का कोई मतलब नहीं है। ईरान का यह कड़ा रुख बताता है कि आने वाले दिनों में स्थिति और भी गंभीर हो सकती है, जिससे समुद्री रास्तों पर व्यापार प्रभावित होने का खतरा है।

इस तनाव का खाड़ी देशों और प्रवासियों पर क्या होगा असर?

खाड़ी क्षेत्र में बढ़ते तनाव का सीधा असर वहां काम कर रहे लाखों भारतीयों और अन्य प्रवासियों पर पड़ता है। समुद्री रास्तों, खासकर Strait of Hormuz पर नियंत्रण को लेकर जारी बयानबाजी से तेल की कीमतों और सप्लाई चैन पर असर पड़ने की संभावना है। मुख्य प्रभाव इस प्रकार देखे जा रहे हैं:

मुख्य क्षेत्र ताजा स्थिति और संभावित असर
Strait of Hormuz ईरान की सेना ने कहा है कि यह इलाका पूरी तरह उनके नियंत्रण में है और दुश्मनों के लिए इसे नहीं खोला जाएगा।
कुवैत और सुरक्षा ड्रोन हमलों के खतरों को देखते हुए कुवैत ने पहले ही ईरान के राजदूत को तलब किया था।
फ्लाइट्स और यात्रा तनाव बढ़ने से हवाई रास्तों में बदलाव हो सकता है, जिससे यात्रा में देरी और टिकट महंगे हो सकते हैं।
भारतीय प्रवासी खाड़ी में रह रहे भारतीयों को सलाह दी जा रही है कि वे स्थानीय सुरक्षा गाइडलाइंस और दूतावास की सूचनाओं पर नज़र रखें।

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने दावा किया था कि ईरान ने सीजफायर की मांग की है, लेकिन ईरान के विदेश मंत्रालय ने इसे पूरी तरह गलत और बेबुनियाद करार दिया है। पाकिस्तान जैसे देश इस मामले में मध्यस्थता की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन फिलहाल शांति की कोई ठोस उम्मीद नजर नहीं आ रही है। सुरक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि अप्रैल के पहले हफ्ते में सीजफायर होने की उम्मीद अब मात्र 1 प्रतिशत रह गई है।