ईरान और अमेरिका के बीच हाल ही में एक समझौता हुआ है, लेकिन Strait of Hormuz को लेकर तनाव अब भी बना हुआ है। ईरान का कहना है कि इस समुद्री रास्ते का प्रबंधन उसकी जिम्मेदारी है और वह इसके लिए शुल्क ले सकता है। वहीं, दूसरी तरफ अमेरिका और ईरान के बीच शांति के लिए एक डिजिटल समझौता साइन किया गया है, लेकिन ज़मीनी हालात अब भी तनावपूर्ण हैं।
ईरान का सर्विस चार्ज लेने का फैसला
ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अरागची ने बयान दिया है कि Strait of Hormuz पर ईरान का अधिकार है और इसका प्रबंधन उसकी जिम्मेदारी रहेगी। उन्होंने कहा कि अंतरराष्ट्रीय कानून के हिसाब से ईरान और ओमान जैसे तटीय देशों का इस रास्ते की निगरानी में कानूनी हक है। ईरान ने साफ़ किया है कि वह कोई टोल टैक्स नहीं लेगा, लेकिन नेविगेशन सहायता, पायलट सेवाओं और समुद्री सुरक्षा के लिए ‘सर्विस चार्ज’ ले सकता है।
अंतरराष्ट्रीय नियम और IMO की राय
समुद्री नियमों के मुताबिक, Strait of Hormuz एक अंतरराष्ट्रीय रास्ता है जहाँ सभी जहाज़ों को बिना किसी रोक-टोक के निकलने का अधिकार है। International Maritime Organization (IMO) के महासचिव आर्सेनियो डोमिंगुएज़ ने कहा है कि अंतरराष्ट्रीय रास्तों पर पैसे वसूलने का कोई कानूनी आधार नहीं है। IMO फिलहाल ईरान के इस दावे की जांच कर रहा है ताकि जहाज़ों की आवाजाही में कोई दिक्कत न आए।
अमेरिका और ईरान के बीच नया समझौता
अमेरिका और ईरान ने 14 जून को एक समझौता ज्ञापन (MOU) पर डिजिटल हस्ताक्षर किए हैं ताकि हालिया संघर्ष को खत्म किया जा सके। इस समझौते के बाद 19 जून को स्विट्जरलैंड में एक औपचारिक समारोह होगा। इसके बाद 60 दिनों तक तकनीकी बातचीत चलेगी, जिसमें ईरान के परमाणु कार्यक्रम और Strait of Hormuz के भविष्य पर चर्चा होगी। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का मानना है कि यह रास्ता बिना किसी टोल के पूरी तरह खुल जाना चाहिए।
ड्रोन हमले और शिपिंग कंपनियों की चिंता
समझौते के बावजूद हालात पूरी तरह सामान्य नहीं हुए हैं। रिपोर्ट्स के मुताबिक, ईरान की IRGC ने 14 जून के बाद से हर रात कमर्शियल जहाज़ों की तरफ कई ड्रोन छोड़े हैं। अमेरिकी सेना ने इन ड्रोनों को समय पर इंटरसेप्ट करके नष्ट कर दिया। इस वजह से शिपिंग कंपनियां अभी भी डर रही हैं और कई जहाज़ अपना रास्ता बदलकर ओमान के समुद्री क्षेत्र से गुज़र रहे हैं।
ओमान की भूमिका और आंतरिक विवाद
ओमान ने ईरान के साथ मिलकर यह भरोसा दिलाया है कि वे समुद्री सुरक्षा और जहाज़ों की आवाजाही को अंतरराष्ट्रीय कानून के हिसाब से सुरक्षित रखेंगे। दूसरी ओर, ईरान के अंदर इस समझौते को लेकर विवाद शुरू हो गया है। वहां के कुछ कट्टरपंथी गुट अमेरिका के साथ बातचीत का विरोध कर रहे हैं और उन्होंने ‘We Do Not Accept’ नाम से अभियान भी शुरू किया है।