ईरान और अमेरिका के बीच एक अंतरिम शांति समझौता हुआ है जिससे अब युद्ध थमने की उम्मीद है। इस समझौते के बाद होर्मुज़ जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) को फिर से खोला जाएगा ताकि व्यापारिक जहाज़ आसानी से आ-जा सकें। दोनों देशों ने आपसी तनाव को कम करने के लिए यह बड़ा कदम उठाया है।
इस समझौते को एक Memorandum of Understanding (MoU) के रूप में तैयार किया गया है, जिस पर 17 जून 2026 को इलेक्ट्रॉनिक हस्ताक्षर हुए। 19 जून 2026 को जेनेवा में इसका औपचारिक signing समारोह होगा। इस डील के जरिए दोनों देशों को अंतिम समझौते पर बात करने के लिए 60 दिनों का समय मिला है।
समझौते की मुख्य शर्तें
इस डील में कई अहम बातों पर सहमति बनी है, जिनका विवरण नीचे दी गई टेबल में है:
| मुख्य बिंदु | विवरण |
|---|---|
| सैन्य कार्रवाई | लेबनान समेत सभी मोर्चों पर सैन्य ऑपरेशन तुरंत बंद होंगे |
| व्यापारिक रास्ता | होर्मुज़ जलडमरूमध्य को कमर्शियल शिपिंग के लिए फिर से खोला जाएगा |
| नाकेबंदी | अमेरिका ईरान के बंदरगाहों से अपनी नौसेना की नाकेबंदी हटाएगा |
| परमाणु हथियार | ईरान परमाणु हथियार नहीं बनाएगा और IAEA की निगरानी में रहेगा |
| तेल निर्यात | अमेरिका ईरान को ग्लोबल मार्केट में तेल बेचने की छूट देगा |
| फंड की वापसी | अमेरिका ईरान के फ्रीज किए हुए पैसे और संपत्ति वापस करेगा |
| आर्थिक मदद | ईरान के पुनर्निर्माण के लिए 300 अरब डॉलर का फंड प्लान बनाया जाएगा |
ईरान के अंदर छिड़ी राजनीतिक जंग
इस डील के बाद ईरान की सरकार के अंदर भारी मतभेद सामने आए हैं। वहां के कट्टरपंथी गुट इस समझौते का कड़ा विरोध कर रहे हैं। ‘Kayhan’ अखबार ने इस MoU को अमेरिका के सामने सरेंडर बताया है, जबकि ‘Khorasan’ अखबार का कहना है कि यह शांति नहीं बल्कि सिर्फ एक छोटा ब्रेक है।
दूसरी तरफ, ‘Shargh’ और ‘Etemad’ जैसे सुधारवादी अखबार इस फैसले का समर्थन कर रहे हैं। उनका मानना है कि इससे देश पर आर्थिक दबाव कम होगा और स्थिरता आएगी। कुछ लोगों का यह भी कहना है कि यह 2015 के परमाणु समझौते से बेहतर है क्योंकि इसमें ईरान की रणनीतिक पकड़ बनी हुई है।
अंतरराष्ट्रीय प्रतिक्रिया और मध्यस्थता
अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump और उपराष्ट्रपति JD Vance ने इस समझौते की पुष्टि की है। इस पूरी प्रक्रिया में पाकिस्तान के प्रधानमंत्री Shehbaz Sharif और कतर ने अहम मध्यस्थ की भूमिका निभाई है।
हालांकि, इसराइल में इस डील को लेकर काफी गुस्सा है। वहां के नेता और रक्षा मंत्री Israel Katz ने इसकी आलोचना की है। कई राजनीतिक दिग्गजों ने इसे इसराइल के लिए एक बड़ी विफलता बताया है।