ईरान और अमेरिका के बीच तनाव अब सीधे टकराव में बदल गया है। ईरान की रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) ने अमेरिका के सैन्य ठिकानों को निशाना बनाया है। यह हमला अमेरिका द्वारा दक्षिणी ईरान में किए गए एयरस्ट्राइक का बदला बताया जा रहा है। दोनों देशों के बीच युद्ध जैसी स्थिति बन गई है।
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हमले की पूरी कहानी
मामला 26 जून 2026 को बढ़ा जब ईरान की IRGC ने इलाके में मौजूद अमेरिकी मिलिट्री ठिकानों पर हमला किया। इससे पहले उसी दिन अमेरिका ने ईरान के मिसाइल और ड्रोन स्टोरेज सेंटर्स और तटीय रडार साइट्स पर एयरस्ट्राइक की थी। US Central Command (CENTCOM) ने इस हमले की पुष्टि की है।
इन हमलों की शुरुआत 25 जून को हुई थी। ईरान ने स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में सिंगापुर के झंडे वाले एक कमर्शियल जहाज M/V Ever Lovely पर ड्रोन हमला किया था। अमेरिका ने इसी हमले का जवाब देने के लिए ईरान पर बमबारी की थी।
क्या था बीच का समझौता
दोनों देशों के बीच 17 जून 2026 को एक समझौता हुआ था, जिसे इस्लामाबाद मेमोरेंडम कहा जाता है। इस पर अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump और ईरान के राष्ट्रपति Masoud Pezeshkian ने दस्तखत किए थे। इस समझौते में कुछ मुख्य बातें थीं:
- लेबनान में सैन्य ऑपरेशन पूरी तरह बंद होंगे।
- स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को फिर से खोला जाएगा।
- अमेरिका इलाके में अपनी सेना कम करेगा।
- ईरान पर लगे प्रतिबंधों में ढील दी जाएगी।
- ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर 60 दिनों के भीतर फैसला होगा।
बड़े नेताओं ने क्या कहा
ईरान की संसद की नेशनल सिक्योरिटी कमेटी के चेयरमैन Ebrahim Azizi ने अमेरिका पर आरोप लगाया कि उसने समझौते का उल्लंघन किया है। उन्होंने कहा कि अमेरिका लेबनान में सैन्य अभियान बंद करने की शर्त को मानने में नाकाम रहा। ईरान का कहना है कि स्ट्रेट ऑफ होर्मुज पर उनका नियंत्रण है और वे केवल व्यवस्था संभाल रहे हैं।
वहीं अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump ने ईरान के ड्रोन हमले को एक मूर्खतापूर्ण उल्लंघन बताया। अमेरिका के उपराष्ट्रपति JD Vance ने चेतावनी दी है कि हिंसा का जवाब हिंसा से ही दिया जाएगा। उन्होंने कहा कि अगर ईरान को कोई शिकायत है तो वे फोन उठाकर बात कर सकते हैं।
जहाजों और व्यापार पर असर
20 जून को ईरान ने स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को अस्थायी रूप से बंद कर दिया था। ईरान ने अब खाड़ी देशों को चेतावनी दी है कि वे वॉशिंगटन का समर्थन न करें। ईरान ने साफ कहा है कि स्ट्रेट ऑफ होर्मुज पर उनका कंट्रोल रहेगा और जहाजों को केवल उन्हीं रास्तों का इस्तेमाल करना होगा जिन्हें ईरान मंजूर करेगा।
