ईरान और अमेरिका के बीच चल रही बातचीत में एक बड़ा मोड़ आया है. ईरान के मुख्य वार्ताकार मोहम्मद बागेर गालिबफ ने अमेरिका पर गंभीर आरोप लगाए हैं. उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि अमेरिका अपने वादों को पूरा करने की न तो इच्छा रखता है और न ही उसमें इतनी काबिलियत है.

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यह कड़ा बयान तब आया जब इसराइल ने बेरूत के दक्षिणी इलाकों में हमला किया. गालिबफ ने कहा कि अगर अमेरिका अपनी प्रतिबद्धताओं को पूरा नहीं कर सकता, तो इस रास्ते पर आगे बात करने का कोई मतलब नहीं है. उन्होंने 13 जून को सोशल मीडिया पर भी चेतावनी दी थी कि किए गए वादों को बिना किसी बहाने के पूरा किया जाना चाहिए.

समझौते की शर्तें और विवाद

दोनों देशों के बीच एक समझौते (MoU) पर बातचीत चल रही थी, जिसे दो चरणों में बांटा गया था. पहले चरण में युद्ध को खत्म करने, होर्मुज जलडमरूमध्य को फिर से खोलने और ईरान को आर्थिक लाभ देने की बात थी. इसमें प्रतिबंध हटाना और जमी हुई रकम वापस करना शामिल था. दूसरे चरण में परमाणु मुद्दे को सुलझाने की योजना थी.

हालांकि, इस समझौते को लेकर दोनों पक्षों की राय अलग थी. अमेरिकी अधिकारियों का कहना था कि इससे ईरान का परमाणु कार्यक्रम खत्म हो जाएगा. वहीं ईरान के कुछ मीडिया ग्रुप्स ने इसे केवल एक ‘टैक्टिकल पॉज’ या छोटा ब्रेक बताया, ताकि दोनों पक्ष अपनी सैन्य ताकत बढ़ा सकें.

राजनीतिक दबाव और विरोध

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप चाहते थे कि इस समझौते पर रविवार, 14 जून को हस्ताक्षर हों, क्योंकि उस दिन उनका 80वां जन्मदिन था. इस वर्चुअल मीटिंग में अमेरिकी उपराष्ट्रपति JD Vance और ईरानी संसद अध्यक्ष गालिबफ के शामिल होने की उम्मीद थी. लेकिन ईरान के भीतर इस डील का कड़ा विरोध हुआ. तेहरान और मशहद में प्रदर्शनकारियों ने वार्ता टीम के खिलाफ गुस्सा जाहिर किया.

ईरान के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता इस्माइल बगाई ने स्पष्ट किया कि अमेरिका के साथ कोई भी समझ सिर्फ बातचीत को आगे बढ़ाने का एक जरिया होगी, इसे अंतिम समझौता नहीं माना जा सकता. इस पूरी बातचीत में पाकिस्तान और कतर बीच-बचाव करने वाले देशों की भूमिका निभा रहे थे.