ईरान और अमेरिका के बीच हुए एक शांति समझौते ने अब ईरान के अंदर ही एक बड़ी बहस छेड़ दी है। सुप्रीम लीडर Mojtaba Khamenei ने इस समझौते पर अपनी कुछ आपत्तियां जताई थीं, जिसका फायदा अब ईरान के कट्टरपंथी गुट उठा रहे हैं। इस वजह से अमेरिका के साथ होने वाली बातचीत और शांति की कोशिशों पर संकट मंडराने लगा है।

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समझौते की शुरुआत और शर्तें

18 जून 2026 को अमेरिका के राष्ट्रपति Donald Trump और ईरान के राष्ट्रपति Masoud Pezeshkian के बीच एक अस्थायी शांति समझौता हुआ था। इस डील का मकसद क्षेत्रीय संघर्ष को खत्म करना और ईरान के परमाणु कार्यक्रम जैसे मुद्दों पर बात करने के लिए 60 दिन का समय तय करना था। इसके बदले में अमेरिका ने ईरानी बंदरगाहों की अपनी नौसैनिक नाकाबंदी भी हटा ली थी।

सुप्रीम लीडर का रुख और अंदरूनी विवाद

सुप्रीम लीडर Mojtaba Khamenei ने इस समझौते को मंजूरी तो दे दी, लेकिन साथ ही यह भी साफ किया कि उनके मन में इसे लेकर कुछ शंकाएं और आपत्तियां हैं। उन्होंने यह अनुमति राष्ट्रपति Pezeshkian के इस भरोसे पर दी कि ईरान के अधिकारों और ‘प्रतिरोध मोर्चे’ (Resistance Front) के हितों की पूरी रक्षा की जाएगी।

अब ईरान के कट्टरपंथी गुट इस बात का इस्तेमाल कर रहे हैं। उनका कहना है कि यह समझौता अमेरिका के सामने घुटने टेकने जैसा है। इन गुटों ने सरकारी टेलीविजन (IRIB) जैसे माध्यमों से इस डील का विरोध तेज कर दिया है।

स्विट्जरलैंड मीटिंग का रद्द होना

समझौते के बाद 19 जून 2026 को स्विट्जरलैंड में अमेरिका और ईरान के बीच बातचीत होनी थी, लेकिन इसे अचानक रद्द कर दिया गया। यह फैसला तब आया जब इजरायल और लेबनान में ईरान समर्थित हिजबुल्लाह के बीच फिर से लड़ाई शुरू हो गई। अमेरिका के उपराष्ट्रपति J.D. Vance, जो इस बातचीत का नेतृत्व कर रहे थे, उन्होंने अपनी यात्रा रद्द कर दी।

प्रमुख अधिकारियों के बयान

  • मोहम्मद बागेर गालिबाफ (संसद अध्यक्ष): उन्होंने इस समझौते को एक ऐतिहासिक उपलब्धि और अमेरिका की विफलता बताया।
  • अब्बास अराघची (विदेश मंत्री): उन्होंने कहा कि इस डील के तहत इजरायल को लेबनान से हटना होगा, हालांकि इजरायल ने इस शर्त को मानने से इनकार कर दिया है।
  • काज़ेम घरिबाबादी (उप विदेश मंत्री): उन्होंने इसे ईरान की बड़ी जीत बताया और कहा कि सैन्य अभियानों को तुरंत खत्म करना जरूरी था।
  • UN एक्सपर्ट्स: संयुक्त राष्ट्र के विशेषज्ञों ने कहा कि अगर इस समझौते में मानवाधिकारों की अनदेखी हुई, तो यह अधूरा रहेगा।