ईरान के संसद स्पीकर मोहम्मद बागेर गालिबफ ने अमेरिका और इसराइल को सख्त चेतावनी दी है। उन्होंने साफ़ किया कि ईरान कूटनीति और बातचीत का रास्ता अपना रहा है, लेकिन किसी भी तरह के दबाव को बर्दाश्त नहीं करेगा। गालिबफ के मुताबिक, अगर समझौतों का पालन नहीं हुआ तो ईरान कड़ा कदम उठाएगा।
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समझौते पर ईरान का सख्त रुख
गालिबफ ने बताया कि इस्लामाबाद मेमोरेंडम ऑफ अंडरस्टैंडिंग (MOU) को लागू करना अब सबसे ज़रूरी है। 3 जुलाई 2026 को उन्होंने चेतावनी दी कि अगर अमेरिका और इसराइल अपनी ज़िम्मेदारियाँ पूरी नहीं करते, तो ईरान फिर से अपनी जवाबी कार्रवाई शुरू कर देगा। फिलहाल बातचीत में 9 जुलाई तक का ब्रेक लिया गया है।
उन्होंने साफ़ कहा कि ईरान युद्ध के लिए भी तैयार है अगर अमेरिका समझौते से मुकरता है। उन्होंने इस तरीके को दबाव वाली कूटनीति बताया और कहा कि समझौते कमजोरी की वजह से नहीं बल्कि रणनीतिक उद्देश्यों को पूरा करने के लिए किए गए हैं।
बातचीत के लिए रखी शर्तें
ईरान ने कुछ शर्तें रखी हैं जिन्हें पूरा किए बिना वह आगे की किसी भी बातचीत में शामिल नहीं होगा। मुख्य शर्तें इस प्रकार हैं:
- लेबनान में युद्ध को पूरी तरह रोकना
- देश पर लगी नाकेबंदी को हटाना
- होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) को फिर से खोलना
- तेल के निर्यात की अनुमति देना
- फ्रीज की गई संपत्तियों को वापस लौटाना
जब तक ये पाँचों शर्तें पूरी नहीं होतीं, ईरान समझौते के अगले चरण पर आगे नहीं बढ़ेगा।
संप्रभुता और मिसाइल प्रोग्राम
गालिबफ ने होर्मुज जलडमरूमध्य पर ईरान के पूरे अधिकार की बात कही और इसे देश की सबसे बड़ी रणनीतिक संपत्ति बताया। उन्होंने साफ़ किया कि ईरान का मिसाइल प्रोग्राम और यूरेनियम संवर्धन उसका कानूनी अधिकार है और इस पर कोई समझौता नहीं किया जाएगा।
मध्यस्थ देशों की भूमिका
इन वार्ताओं को सफल बनाने में पाकिस्तान और कतर ने मध्यस्थ की भूमिका निभाई है। वहीं, होर्मुज जलडमरूमध्य के मैनेजमेंट और समुद्री सेवाओं के लिए ईरान ओमान के साथ मिलकर काम कर रहा है। लेबनान में शांति बहाल करना भी इस पूरे समझौते का एक अहम हिस्सा है, जिसमें ईरान और अमेरिका गारंटी देने वाले देशों के रूप में शामिल हैं।
