क्या दुनिया बदल रही है अपनी महाशक्ति, नए वैश्विक चक्र और शक्ति संतुलन पर डॉ ब्रजेश कुमार मिश्र का विश्लेषण.

दुनिया के बदलते समीकरणों के बीच क्या हम किसी नए शक्ति-चक्र में कदम रख रहे हैं, यह सवाल आज अंतरराष्ट्रीय राजनीति में सबसे चर्चा का विषय बना हुआ है। इतिहास गवाह है कि रोमन साम्राज्य से लेकर ब्रिटिश शासन और आज के दौर के संयुक्त राज्य अमेरिका तक, हर महाशक्ति का एक समय होता है जब उसका उत्थान होता है और अंत में उसका अवसान भी होता है। इसी ऐतिहासिक अनुभव को समझने के लिए विशेषज्ञ जॉर्ज मॉडल्स्की (George Modelski) के 'लॉन्ग साइकिल थ्योरी' (Long Cycle Theory) का उदाहरण देते हैं, जो विश्व राजनीति को 100 से 120 वर्षों के चक्र में बांटकर देखती है।
शक्ति के चक्र और बदलती वैश्विक व्यवस्था
जॉर्ज मॉडल्स्की के अनुसार, दुनिया की सत्ता का यह चक्र चार मुख्य चरणों से गुजरता है। इसमें पहला चरण वैश्विक युद्ध, दूसरा विश्व नेतृत्व, तीसरा वैधता का क्षय और चौथा शक्ति का विकेन्द्रीकरण होता है। जब एक महाशक्ति का प्रभाव कम होने लगता है, तो संसाधनों और प्रभाव के लिए नई शक्तियों का उदय होता है। आज के दौर में रूस-यूक्रेन युद्ध, पश्चिम एशिया का तनाव, अमेरिका और चीन के बीच तकनीकी प्रतिस्पर्धा और कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) की दौड़ इसी ओर इशारा करती हैं कि विश्व व्यवस्था फिर से पुनर्समायोजन के दौर से गुजर रही है।
वर्तमान वैश्विक हालात और भारत की भूमिका
चीन का आर्थिक विस्तार, हिंद-प्रशांत क्षेत्र में बदलती रणनीतियां और वैश्विक आपूर्ति शृंखला का फिर से तैयार होना यह बताता है कि अमेरिकी नेतृत्व वाली व्यवस्था को अब गंभीर चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। हालाँकि, यह कहना जल्दबाजी होगी कि कोई नई महाशक्ति अमेरिका की जगह पूरी तरह ले चुकी है। वर्तमान स्थिति को हम केवल अमेरिका के पतन के रूप में नहीं, बल्कि शक्ति के क्रमिक पुनर्वितरण के रूप में देख सकते हैं। आज भी अमेरिका सैन्य शक्ति, तकनीक और वैश्विक वित्तीय व्यवस्था में बहुत आगे है।
वहीं, भारत के लिए यह दौर चुनौतियों के साथ-साथ एक बड़ा मौका लेकर आया है। भारत न तो किसी एक गुट का स्थायी हिस्सा बनना चाहता है और न ही पुरानी ध्रुवीय राजनीति का समर्थन करता है। 'विकसित भारत-2047' के लक्ष्य के साथ भारत अपनी विदेश नीति को रणनीतिक स्वायत्तता पर केंद्रित कर रहा है। भारत का क्वाड (QUAD) के माध्यम से सुरक्षा सहयोग बढ़ाना और साथ ही BRICS व शंघाई सहयोग संगठन (SCO) जैसे मंचों पर सक्रिय रहना यह बताता है कि भारत एक संतुलित और बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था का पक्षधर है। भारत-मध्य पूर्व-यूरोप आर्थिक गलियारा (IMEC) जैसी परियोजनाएं यह बताती हैं कि आने वाले समय में भारत की भूमिका वैश्विक मंच पर और भी मजबूत होने वाली है।
विभिन्न सिद्धांतों का नजरिया
दुनिया को समझने के लिए केवल एक सिद्धांत काफी नहीं है। इमैनुअल वलस्ट्रीन का विश्व-प्रणाली सिद्धांत अर्थव्यवस्था पर जोर देता है, जबकि पॉल कैनेडी का 'इंपीरियल ओवरस्ट्रेच' विचार यह कहता है कि जब सैन्य प्रतिबद्धताएं आर्थिक क्षमता से ज्यादा हो जाती हैं, तब महाशक्ति का पतन शुरू हो जाता है। वहीं रॉबर्ट गिल्पिन के अनुसार, अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था का बदलाव तब होता है जब उभरती शक्तियां पुरानी ताकत से बेहतर आर्थिक और सामरिक क्षमता हासिल कर लेती हैं। इन सभी विशेषज्ञों के दृष्टिकोणों को मिलाकर देखें, तो साफ होता है कि विश्व राजनीति का इतिहास आकस्मिक नहीं, बल्कि गहरे आर्थिक और सामरिक चक्रों का परिणाम है।