इस्लामाबाद में सरकारी एजेंसी CDA द्वारा चलाए जा रहे तोड़फोड़ अभियान ने लोगों के बीच डर पैदा कर दिया है। मानवाधिकार संगठनों का आरोप है कि यह कार्रवाई सिर्फ गरीबों के खिलाफ है। करीब 5 लाख लोग अपनी बस्तियों से बेघर होने की कगार पर हैं और इस मुद्दे पर अब कानूनी लड़ाई तेज हो गई है।

किन लोगों पर पड़ रहा है असर और क्या है मुख्य विवाद?

इस अभियान का सबसे बुरा असर ‘कच्ची आबादियों’ यानी अनौपचारिक बस्तियों में रहने वाले करीब 5 लाख लोगों पर पड़ रहा है। मानवाधिकार आयोग (HRCP) और अन्य समूहों का कहना है कि सरकार 2015 में सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिए गए स्टे ऑर्डर की अनदेखी कर रही है। लोगों का दावा है कि पाकिस्तान के संविधान के अनुच्छेद 9 के तहत घर पाना उनके जीवन के अधिकार से जुड़ा है, जबकि प्रशासन इसे अवैध निर्माण बताकर हटा रहा है।

तोड़फोड़ अभियान और विरोध की पूरी समयरेखा

पिछले कुछ समय में इस्लामाबाद में कई इलाकों में तनाव देखा गया है। नीचे दी गई टेबल से समझें कि अब तक क्या-क्या हुआ है:

तारीख/समय क्या घटना हुई
15 अप्रैल 2026 मानवाधिकार समूहों ने तोड़फोड़ अभियान को गरीब विरोधी बताते हुए विरोध जताया।
14 अप्रैल 2026 HRCP की बैठक हुई और नूरपुर शाहन में विरोध प्रदर्शन के दौरान पुलिसकर्मी घायल हुए।
7 अप्रैल 2026 इस्लामाबाद हाई कोर्ट (IHC) ने रोक हटाने का फैसला किया जिससे CDA को कार्रवाई की अनुमति मिली।
30 मार्च 2026 अल्लामा इकबाल कॉलोनी में जबरन बेदखली का विरोध हुआ, जहाँ अल्पसंख्यक समुदाय रहता है।
27 मार्च 2026 HRCP ने कच्ची आबादियों में हो रही बेदखली पर आपातकालीन बैठक बुलाई।
2025 के अंत में मुस्लिम कॉलोनी और बारी इमाम में करीब 25,000 लोग बेघर हुए।
2015 सुप्रीम कोर्ट ने कच्ची आबादियों को अचानक खाली कराने पर रोक लगाई थी।
2001 नेशनल हाउसिंग पॉलिसी आई थी, जिसमें बिना रिसेटलमेंट प्लान के बेदखली पर रोक थी।

CDA और मानवाधिकार संगठनों के दावों में क्या अंतर है?

CDA के प्रवक्ता शाहिद कियानी का कहना है कि वे सिर्फ अवैध बस्तियों को हटा रहे हैं ताकि जमीन वापस ली जा सके और इंफ्रास्ट्रक्चर का विकास हो। उनके मुताबिक केवल 10 इलाकों को नियमित किया गया है, बाकी सब अवैध हैं। वहीं, HRCP के महासचिव हारिस खलीक ने कहा कि करीब 55 बस्तियां खतरे में हैं और इनमें से केवल 11 को ही मंजूरी मिली है। आवामी वर्कर्स पार्टी (AWP) का आरोप है कि अमीर डेवलपर्स की अवैध स्कीमों को छोड़कर सिर्फ मजदूर वर्ग के घरों को निशाना बनाया जा रहा है।