अमेरिका की राजधानी वॉशिंगटन डी.सी. में इज़राइल और लेबनान के बीच एक बहुत बड़ी बैठक हुई। करीब 30 साल बाद दोनों देशों के प्रतिनिधियों ने आमने-सामने बैठकर बातचीत की है। अमेरिका ने इस मुलाकात में बीच-बचाव की भूमिका निभाई ताकि इलाके में शांति लौट सके। इस बातचीत को संयुक्त बयान में सकारात्मक बताया गया है।
बातचीत में क्या हुआ और कौन शामिल था?
इस बैठक में इज़राइल की तरफ से राजदूत Yechiel Leiter और लेबनान की तरफ से राजदूत Nada Hamadeh ने हिस्सा लिया। अमेरिकी विदेश मंत्री Marco Rubio ने भी इस चर्चा में शिरकत की और इसे एक ऐतिहासिक मौका बताया। इस मुलाकात का मुख्य मकसद आने वाले समय के लिए एक ऐसा ढांचा तैयार करना था जिससे दोनों देश सीधी बातचीत शुरू कर सकें। ब्रिटेन, फ्रांस और ऑस्ट्रेलिया समेत 17 देशों ने भी इस कदम का स्वागत किया है।
शांति के लिए क्या शर्तें रखी गईं?
दोनों देशों ने अपनी-अपनी प्राथमिकताएं साफ कर दी हैं। लेबनान चाहता है कि इज़राइल उसकी जमीनों से अपनी सेना हटाए और तुरंत युद्धविराम हो। वहीं इज़राइल ने स्पष्ट किया है कि वह शांति और सामान्य रिश्तों के लिए तैयार है, लेकिन इसके लिए Hezbollah का पूरी तरह हथियार डालना जरूरी है।
| पक्ष | मुख्य मांग और उद्देश्य |
|---|---|
| इज़राइल | Hezbollah का निशस्त्रीकरण और स्थायी शांति समझौता |
| लेबनान | इज़राइली कब्जे वाली जमीनों से वापसी और युद्धविराम |
| अमेरिका | स्थायी शांति के लिए एक फ्रेमवर्क तैयार करना |
Hezbollah का विरोध और मौजूदा हालात
Hezbollah के नेता Naim Qassem ने इस बातचीत का कड़ा विरोध किया है और इसे बेकार बताया है। उन्होंने लेबनान सरकार से इन चर्चाओं से पीछे हटने की अपील की है। एक तरफ वॉशिंगटन में बातचीत चल रही थी, तो दूसरी तरफ जमीन पर तनाव बना रहा। Hezbollah ने उत्तरी इज़राइल के 13 कस्बों पर रॉकेट दागे, जबकि इज़राइल ने भी दक्षिणी लेबनान में अपनी सैन्य कार्रवाई जारी रखी जिससे दोनों तरफ नुकसान हुआ।
