इसराइल ने साफ़ कह दिया है कि वह दक्षिण लेबनान से अपनी सेना वापस नहीं बुलाएगा। अमेरिका और दुनिया के कई देशों के दबाव के बाद भी इसराइल ने अपनी सैन्य मौजूदगी बरकरार रखने का फैसला किया है। हिजबुल्लाह के खिलाफ सैन्य कार्रवाई भी आगे जारी रहेगी।

सैन्य मौजूदगी पर आधिकारिक बयान

इसराइल के रक्षा मंत्री Israel Katz और प्रधानमंत्री Benjamin Netanyahu ने साफ़ किया है कि वे लेबनान, सीरिया या गाज़ा से पीछे नहीं हटेंगे। रक्षा मंत्री Katz ने 21 जून 2026 को बताया कि सुरक्षा क्षेत्र में मौजूद उनकी सेना उत्तरी इलाकों की सुरक्षा के लिए ज़रूरी है। प्रधानमंत्री Netanyahu ने भी कहा कि जब तक ज़रूरत होगी, सेना वहीं रहेगी और अमेरिका से सेना हटाने का कोई अनुरोध नहीं मिला है।

इसराइल के अमेरिका स्थित राजदूत Yechiel Leiter ने भी पुष्टि की है कि सेना को वापस बुलाने की फिलहाल कोई योजना नहीं है। सरकारी अधिकारियों का कहना है कि सेना की वापसी अभी चर्चा का विषय नहीं है और यह केवल कुछ खास शर्तों और Beirut के साथ समझौते के बाद ही सोचा जाएगा।

हिजबुल्लाह और अंतरराष्ट्रीय स्थिति

दूसरी तरफ हिजबुल्लाह के प्रमुख Naim Qassem ने इसराइल के इस रुख को खारिज कर दिया है। उन्होंने साफ़ कहा कि जब तक इसराइली सेना लेबनान की ज़मीन से पूरी तरह बाहर नहीं निकलती, तब तक किसी भी ceasefire (युद्धविराम) को स्वीकार नहीं किया जाएगा। उनके मुताबिक लेबनान की मिट्टी पर इसराइल की मौजूदगी मुमकिन नहीं है।

इस बीच संयुक्त राष्ट्र की फोर्स UNIFIL का कार्यकाल 2026 के अंत में खत्म होने वाला है। अमेरिका का मानना है कि लेबनान की अपनी सेना को अब ज़्यादा ज़िम्मेदारी संभालनी चाहिए। इसराइल और अमेरिका के बीच इस बात को लेकर बातचीत चल रही है कि लिटानी नदी के दक्षिण के इलाकों पर नियंत्रण कैसे रहेगा।

युद्ध का असर

मार्च 2026 से शुरू हुए इस युद्ध में इसराइल ने लेबनान के दक्षिण में ज़मीनी हमले किए हैं। इन हमलों में अब तक 4,000 से ज़्यादा लोगों की जान गई है और 10 लाख से ज़्यादा लोग बेघर हुए हैं। इसराइल ने हाल ही में एक नया मैप भी जारी किया है जिसमें दक्षिण लेबनान के और ज़्यादा इलाकों पर अपना सैन्य नियंत्रण दिखाया गया है।