अमेरिका और ईरान के बीच एक नए शांति समझौते (MoU) की चर्चा है जिससे दुनिया को उम्मीद है कि पश्चिम एशिया में शांति आएगी. लेकिन इसराइल इस समझौते को लेकर बिल्कुल खुश नहीं है. Jerusalem Center for Security and Foreign Affairs के CEO Sagiv Steinberg ने चेतावनी दी है कि अगर ईरान ने फिर से परमाणु हथियार या बैलिस्टिक मिसाइलें बनानी शुरू कीं, तो इसराइल बिना अमेरिका की मदद के भी ईरान पर हमला कर सकता है.

क्या है अमेरिका और ईरान का समझौता

अमेरिका और ईरान के बीच एक समझौता हुआ है जिसकी घोषणा रविवार (14 जून 2026) को की गई थी. इस समझौते पर शुक्रवार (19 जून 2026) को स्विट्जरलैंड में दस्तखत होने की उम्मीद है, जिसमें पाकिस्तान ने मध्यस्थ की भूमिका निभाई है. अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump ने इसे क्षेत्रीय स्थिरता के लिए एक बड़ा कदम बताया है. उनका कहना है कि इससे पश्चिम एशिया में शांति आएगी और होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) फिर से खुल सकेगा.

इसराइल को क्यों है डर

इसराइल के विशेषज्ञों का मानना है कि यह कोई स्थायी शांति समझौता नहीं है, बल्कि केवल 60 दिनों का युद्धविराम है. Sagiv Steinberg ने इसे केवल एक ‘टैक्टिकल पॉज़’ बताया है, जो शायद अमेरिका में होने वाले मध्यावधि चुनावों के कारण लिया गया है. उन्हें डर है कि इस समझौते से ईरान को अपनी जमी हुई संपत्ति और प्रतिबंधों से राहत मिल जाएगी, जिसका इस्तेमाल वह Hezbollah और Houthis जैसे अपने गुटों को मजबूत करने में कर सकता है.

ईरान और इसराइल का अपना पक्ष

ईरान के डिप्टी विदेश मंत्री Kazem Gharibabadi ने इस समझौते की पुष्टि की है. उन्होंने कहा कि अमेरिका को पहले अपनी प्रतिबद्धताएं पूरी करनी होंगी, जैसे कि दुश्मनी खत्म करना और ईरान की संपत्ति वापस करना, जिसके बाद अंतिम समझौते के लिए 60 दिनों की बातचीत होगी.

दूसरी तरफ, इसराइल के रक्षा मंत्री Israel Katz ने साफ कर दिया है कि उनकी सेना (IDF) लेबनान, सीरिया और गाजा के सुरक्षा क्षेत्रों में अनिश्चित काल तक टिकी रहेगी ताकि नागरिकों की सुरक्षा की जा सके. उन्होंने यह भी चेतावनी दी कि अगर लेबनान के मुद्दे पर ईरान ने हमला किया, तो इसराइल पूरी ताकत से जवाब देगा. प्रधानमंत्री Benjamin Netanyahu ने भी राष्ट्रपति ट्रंप को साफ कह दिया है कि इसराइल लेबनान से पीछे नहीं हटेगा.