भारत के केंद्र शासित प्रदेश जम्मू-कश्मीर में श्री माता वैष्णो देवी मेडिकल इंस्टीट्यूट (SMVDMI) की मान्यता रद्द कर दी गई है। यह कठोर कदम नेशनल मेडिकल कमीशन (NMC) ने 6 जनवरी 2026 को उठाया। रियासी जिले में स्थित इस कॉलेज को बंद करने का आदेश तब आया, जब दक्षिणपंथी हिंदू समूहों ने हफ्तों तक प्रदर्शन किया। इन समूहों की नाराजगी का मुख्य कारण यह था कि कॉलेज के पहले एमबीबीएस बैच में मेरिट के आधार पर जिन छात्रों का चयन हुआ था, उनमें बहुसंख्यक मुस्लिम थे। आधिकारिक तौर पर सरकार ने कॉलेज में सुविधाओं की कमी का हवाला दिया है, लेकिन आलोचकों का मानना है कि यह फैसला राजनीतिक दबाव में लिया गया है।

50 सीटों पर 42 मुस्लिम छात्र: विवाद की असली वजह

नवंबर 2025 में इस मेडिकल कॉलेज ने अपना पहला शैक्षणिक सत्र शुरू किया था। नीट (NEET) परीक्षा के जरिए मेरिट के आधार पर कुल 50 छात्रों को प्रवेश मिला। आंकड़ों के मुताबिक, इन 50 छात्रों में से 42 मुस्लिम थे, जो मुख्य रूप से कश्मीर घाटी के रहने वाले थे। बाकी छात्रों में सात हिंदू और एक सिख छात्र शामिल थे। जैसे ही हिंदू संगठनों को छात्रों के धर्म के बारे में पता चला, उन्होंने विरोध शुरू कर दिया। प्रदर्शनकारियों का तर्क था कि यह कॉलेज माता वैष्णो देवी मंदिर के चढ़ावे से चलता है, इसलिए इसमें मुस्लिम छात्रों को पढ़ने का अधिकार नहीं होना चाहिए। भाजपा नेताओं ने भी उप-राज्यपाल को पत्र लिखकर मांग की थी कि यहां केवल हिंदू छात्रों को प्रवेश दिया जाए।

आयोग ने बताई कमियां, लेकिन छात्रों का दावा कुछ और है

भारी विरोध प्रदर्शनों के बीच, नेशनल मेडिकल कमीशन (NMC) ने 6 जनवरी को कॉलेज की मान्यता यह कहते हुए रद्द कर दी कि संस्थान न्यूनतम मानकों को पूरा नहीं करता है। आयोग ने दावा किया कि कॉलेज में फैकल्टी, अस्पताल में बेड, ओपीडी में मरीजों की संख्या और ऑपरेशन थिएटर जैसी सुविधाओं की भारी कमी है। हालांकि, वहां पढ़ने वाले छात्रों ने अल जजीरा को बताया कि कॉलेज में कोई कमी नहीं थी। एक छात्र ने कहा कि जहां सरकारी कॉलेजों में एक शव (cadaver) पर पूरा बैच सीखता है, वहां इस कॉलेज में चार शव उपलब्ध थे। छात्रों और राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि अगर कॉलेज में इतनी कमियां थीं, तो शुरुआत में इसे मंजूरी ही क्यों दी गई थी?

‘हमारी मेरिट को धर्म बना दिया गया’

बारामूला की रहने वाली 18 वर्षीय सानिया जान* (बदला हुआ नाम) ने नीट पास करके डॉक्टर बनने का सपना देखा था। उन्हें लगा था कि उनकी मेहनत रंग लाई है, लेकिन अब वह निराश हैं। सानिया ने कहा, “यह एक सपना सच होने जैसा था, लेकिन अब सब कुछ बिखर गया है। यह सब हमारी पहचान की वजह से हुआ। उन्होंने हमारी योग्यता (Merit) को धर्म का मुद्दा बना दिया।” फिलहाल, सभी छात्र अपना सामान पैक करके घर लौट चुके हैं। सानिया के पिता का कहना है कि जब उन्होंने बेटी को कॉलेज छोड़ा था, तो वहां का माहौल बहुत अच्छा था और शिक्षकों का व्यवहार भी बहुत सहयोगी था। धर्म को लेकर कैंपस के अंदर कोई भेदभाव नहीं था।

मुख्यमंत्री का हस्तक्षेप और सरकार की सफाई

इस विवाद के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने घोषणा की है कि छात्रों का भविष्य खराब नहीं होने दिया जाएगा। उन्होंने कहा कि इन 50 छात्रों ने कड़ी मेहनत से नीट परीक्षा पास की है, इसलिए उन्हें क्षेत्र के अन्य मेडिकल कॉलेजों में एडजस्ट किया जाएगा। अब्दुल्ला ने भाजपा और हिंदू समूहों की आलोचना करते हुए कहा कि लोग आमतौर पर मेडिकल कॉलेज खोलने के लिए लड़ते हैं, लेकिन यहां कॉलेज बंद कराने के लिए लड़ाई लड़ी गई। दूसरी ओर, भाजपा प्रवक्ता अल्ताफ ठाकुर ने कहा कि कॉलेज का नाम माता वैष्णो देवी पर है और करोड़ों हिंदुओं की भावनाएं इससे जुड़ी हैं। उन्होंने यह भी कहा कि मान्यता रद्द होने का कारण केवल एनएमसी द्वारा पाई गई कमियां हैं, न कि धर्म।

फंडिंग पर सवाल: क्या यह सिर्फ हिंदू पैसा है?

नेका (National Conference) के विधायक तनवीर सादिक ने बताया कि जिस यूनिवर्सिटी का यह कॉलेज हिस्सा है, उसे 2017 से अब तक सरकार से 1.3 करोड़ डॉलर (लगभग 100 करोड़ रुपये से अधिक) की मदद मिल चुकी है। इसका मतलब है कि इसमें करदाताओं का पैसा भी लगा है, न कि सिर्फ मंदिर का दान। छात्र संघों का कहना है कि यह एक खतरनाक ट्रेंड है। उन्होंने तर्क दिया कि देश भर में कई मुस्लिम संचालित अल्पसंख्यक संस्थान हैं, लेकिन उनकी कोई आधिकारिक नीति हिंदुओं को बाहर रखने की नहीं है। छात्रों को अब सरकार के अगले कदम का इंतजार है ताकि उनका डॉक्टर बनने का साल बर्बाद न हो।

Last Updated: 16 January 2026

GulfHindi Desk

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