कुवैत के विदेश मंत्रालय ने इजरायली संसद (Knesset) द्वारा फलस्तीनी कैदियों को मौत की सजा देने वाले कानून को मंजूरी दिए जाने पर कड़ा विरोध जताया है। 2 अप्रैल 2026 को जारी एक आधिकारिक बयान में कुवैत ने इस कानून की कड़ी निंदा की और इसे अंतरराष्ट्रीय कानूनों का उल्लंघन बताया। यह कानून उन फलस्तीनियों पर लागू करने की योजना है जिन्हें इजरायली नागरिकों पर हमलों का दोषी माना जाएगा। इजरायली संसद ने मार्च के अंत में इस विवादास्पद कानून को अंतिम मंजूरी दी थी।

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इजरायली संसद द्वारा पास किए गए कानून के मुख्य बिंदु क्या हैं?

इजरायल की संसद द्वारा पारित इस नए कानून में फलस्तीनी कैदियों के लिए बेहद सख्त सजाओं का प्रावधान किया गया है। कानून के अनुसार, इजरायली नागरिकों की हत्या के दोषी पाए जाने वाले फलस्तीनियों को फांसी दी जाएगी। इसमें जजों के बीच पूर्ण सहमति की आवश्यकता को हटा दिया गया है और अब केवल बहुमत के आधार पर मृत्युदंड दिया जा सकेगा।

सजा मिलने के बाद किसी भी प्रकार की माफी या कानूनी हस्तक्षेप की अनुमति नहीं होगी, जिससे सजा को कम करना नामुमकिन हो जाएगा। कैदियों को फांसी की सजा की पुष्टि होने के 90 दिनों के भीतर सजा दी जाएगी। इसके अलावा, मौत की सजा पाने वाले कैदियों को जेलों में अलग सुविधाओं में रखा जाएगा और उनकी कानूनी सलाह के लिए वीडियो लिंक का इस्तेमाल किया जा सकता है।

कुवैत और अन्य देशों ने इस पर क्या प्रतिक्रिया दी है?

कुवैत ने इस कानून को मानवता के खिलाफ बताते हुए कहा कि यह अंतरराष्ट्रीय मानदंडों के विपरीत है। कुवैत के साथ-साथ कई अन्य मुस्लिम और अरब देशों ने भी इस पर अपनी आपत्ति दर्ज कराई है। प्रमुख वैश्विक प्रतिक्रियाओं को नीचे दिए गए टेबल में समझा जा सकता है:

संस्था/देश मुख्य प्रतिक्रिया
कुवैत विदेश मंत्रालय कानून की कड़ी निंदा और इसे अंतरराष्ट्रीय कानून का उल्लंघन बताया
संयुक्त राष्ट्र (UN) इसे भेदभावपूर्ण करार दिया और तुरंत रद्द करने की मांग की
खाड़ी सहयोग परिषद (GCC) मानवीय कानूनों का घोर उल्लंघन बताया
फलस्तीनी प्राधिकरण इसे एक युद्ध अपराध और नस्लवादी कानून कहा
सऊदी अरब और UAE संयुक्त बयान जारी कर इसे खतरनाक कदम और अंतरराष्ट्रीय नियमों का उल्लंघन बताया

इस कानून को लेकर दुनिया भर के मानवाधिकार संगठनों ने भी चिंता जताई है। एमनेस्टी इंटरनेशनल ने इसे मानवाधिकारों का अनादर बताया है, जबकि इजरायल के भीतर भी कुछ नागरिक अधिकार संगठनों ने इसके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर की है।