लेबनान सरकार का बड़ा फैसला, ईरान के राजदूत को देश छोड़ने का दिया आदेश, राजदूत ने जाने से किया इनकार
लेबनान और ईरान के बीच राजनयिक संबंध काफी तनावपूर्ण हो गए हैं। लेबनान सरकार ने ईरान के राजदूत मोहम्मद रज़ा शेबानी (Mohammad Reza Sheibani) को ‘पर्सोना नॉन ग्राटा’ यानी अवांछित व्यक्ति घोषित कर दिया है। सरकार ने राजदूत को देश छोड़ने के लिए 29 मार्च 2026 तक की समय सीमा दी थी। हालांकि, तय समय सीमा खत्म होने के बाद भी राजदूत ने लेबनान छोड़ने से साफ इनकार कर दिया है। राजदूत का कहना है कि वह सरकार के इस फैसले का पालन नहीं करेंगे।
लेबनान ने राजदूत को हटाने के लिए क्या कारण दिए हैं?
लेबनान के विदेश मंत्रालय के अनुसार, राजदूत शेबानी पर राजनयिक नियमों के उल्लंघन के गंभीर आरोप लगे हैं। मंत्रालय ने वियना कन्वेंशन की धारा 9 और 41 का हवाला देते हुए यह कार्रवाई की है। राजदूत पर लगे मुख्य आरोप नीचे दी गई तालिका में देख सकते हैं:
| क्रम संख्या | आरोप का विवरण |
|---|---|
| 1 | लेबनान के आंतरिक राजनीतिक मामलों में हस्तक्षेप करना |
| 2 | बिना विदेश मंत्रालय की जानकारी के गैर-आधिकारिक संस्थाओं से मुलाकात करना |
| 3 | लेबनान सरकार के फैसलों की सार्वजनिक रूप से आलोचना करना |
| 4 | राजनयिक मर्यादाओं और प्रोटोकॉल का पालन न करना |
इस विवाद के बीच लेबनान ने ईरान में तैनात अपने राजदूत अहमद सुवैदान को भी विचार-विमर्श के लिए वापस बुला लिया है।
राजदूत के लेबनान न छोड़ने पर अब क्या होगा?
राजनयिक सूत्रों का कहना है कि 29 मार्च की समय सीमा बीतने के बाद राजदूत शेबानी की डिप्लोमैटिक इम्युनिटी यानी राजनयिक छूट खत्म हो सकती है। अगर वह देश में बने रहते हैं, तो लेबनान की सुरक्षा एजेंसियां उन्हें गिरफ्तार करने या जबरन देश से बाहर भेजने की कानूनी कार्रवाई कर सकती हैं। हालांकि, लेबनान के भीतर ही इस फैसले को लेकर दो गुट बन गए हैं।
- हिजबुल्लाह और अमाल मूवमेंट जैसे दलों ने इस फैसले को एक बड़ी गलती बताया है।
- संसद अध्यक्ष नबीह बेरी ने राजदूत से देश न छोड़ने की अपील की है और सरकार के फैसले का विरोध किया है।
- दूसरी तरफ, लेबनानी फोर्सेज और कताएब पार्टी ने सरकार के इस कड़े कदम का समर्थन किया है।
- ईरान के अधिकारियों का कहना है कि अमेरिका के दबाव में आकर यह फैसला लिया गया है।
लेबनान सरकार ने स्पष्ट किया है कि राजदूत को हटाना ईरान के साथ रिश्तों को पूरी तरह खत्म करना नहीं है, बल्कि यह एक अनुशासनात्मक कदम है। फिलहाल पूरे क्षेत्र की नजरें इस बात पर टिकी हैं कि लेबनान की सरकार अगला क्या कदम उठाती है।




