लेबनान और इसराइल के बीच करीब 34 साल बाद सीधी बातचीत की शुरुआत हुई है। अमेरिका के वाशिंगटन में दोनों देशों के प्रतिनिधियों की मुलाकात हुई, जिससे उम्मीद जगी है कि तनाव कम होगा। लेकिन लेबनान की ताकतवर पार्टी हिजबुल्लाह इस बातचीत के सख्त खिलाफ है और इसे सरकार की बड़ी चूक बता रही है।
बातचीत को लेकर विवाद क्या है?
हिजबुल्लाह के अधिकारी हुसैन हाज हसन ने इस फैसले को एक बहुत बड़ी गलती बताया है। उनका मानना है कि लेबनान सरकार इसराइल के सामने बेकार की रियायतें दे रही है। हिजबुल्लाह के मोहम्मद राद ने भी कहा कि बातचीत से पहले युद्ध विराम होना जरूरी है, वरना यह कदम लेबनान की स्थिति को कमजोर करेगा। लेबनान के राष्ट्रपति जोसेफ औन का कहना है कि पहले इसराइल की सेना दक्षिण लेबनान से बाहर जाए, तभी बातचीत का कोई मतलब है।
इसराइल और अमेरिका का इस पर क्या रुख है?
इसराइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने पुष्टि की है कि यह बातचीत 40 साल में पहली बार हो रही है। इसराइल की मुख्य मांग यह है कि हिजबुल्लाह के पास मौजूद हथियारों को खत्म किया जाए ताकि इलाके में स्थाई शांति आए। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कहा कि दोनों देशों के नेताओं की बातचीत से तनाव में थोड़ी कमी आएगी। हालांकि, इस कूटनीति के बीच भी जमीन पर लड़ाई जारी है और दोनों तरफ से हमले हो रहे हैं।
मुख्य विवरण और मांगें
| पक्ष | मुख्य मांग या बयान | स्थिति |
|---|---|---|
| हिजबुल्लाह | बातचीत को ‘सरेंडर’ बताया और रद्द करने की मांग की | विरोध |
| लेबनान सरकार | युद्ध विराम और इसराइली सेना की वापसी जरूरी | शर्तों के साथ तैयार |
| इसराइल | हिजबुल्लाह का निशस्त्रीकरण और स्थाई शांति | बातचीत जारी |
| अमेरिका | दोनों देशों के बीच तनाव कम करना (मध्यस्थता) | सहयोग |
| जमीनी हालात | बिंट जुबैल और उत्तरी इसराइल में हमले जारी | तनावपूर्ण |
