Saudi Arabia: मक्का में सऊदी अरब, तुर्की और पाकिस्तान का नया रक्षा समझौता, भारत के लिए क्या हैं मायने

पश्चिम एशिया के बदलते सुरक्षा माहौल के बीच मक्का में एक नया रक्षा समझौता हुआ है, जिसने पूरी दुनिया का ध्यान अपनी ओर खींच लिया है। 7 अगस्त को अल-सफा पैलेस में सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान, तुर्की के राष्ट्रपति रेजेप ताय्यिप एर्दोआन और पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने एक अहम रक्षा समझौते पर हस्ताक्षर किए। इस दौरान पाकिस्तान के सेना प्रमुख फील्ड मार्शल आसिम मुनीर भी वहां मौजूद रहे। इस नए समझौते के तहत यह नियम बनाया गया है कि अगर किसी एक देश पर कोई सशस्त्र हमला होता है, तो उसे तीनों देशों पर हमला माना जाएगा। यह व्यवस्था काफी हद तक नाटो की धारा पांच जैसी है, हालांकि इसमें वैसी कोई बाध्यकारी सैन्य संरचना या स्पष्ट सैन्य कार्रवाई का प्रावधान सार्वजनिक रूप से सामने नहीं आया है।
मक्का समझौते की जरूरत क्यों पड़ी और इसकी क्या है पृष्ठभूमि
क्षेत्रीय अस्थिरता, ईरान से जुड़े तनाव और अमेरिकी सुरक्षा-प्रतिबद्धताओं को लेकर खड़े हो रहे सवालों ने इन तीनों देशों को सामूहिक सुरक्षा का विकल्प तलाशने के लिए मजबूर कर दिया है। इस गठजोड़ की नींव धार्मिक एकता पर नहीं, बल्कि साझा असुरक्षा और क्षेत्रीय आत्मनिर्भरता पर टिकी है। मक्का में बनी यह सुरक्षा-धुरी अचानक नहीं आई है, बल्कि इसकी शुरुआत पिछले साल सितंबर में सऊदी अरब और पाकिस्तान के बीच हुए रणनीतिक पारस्परिक रक्षा करार से हुई थी। अब इसमें तुर्की के शामिल होने से यह पूरा ढांचा द्विपक्षीय से बदलकर त्रिकोणीय हो गया है। संयुक्त बयान के मुताबिक, इस साझेदारी का मुख्य उद्देश्य सामूहिक निवारक क्षमता को मजबूत करना और रक्षा सहयोग को बढ़ाना है। हालांकि, यह अभी पूरी तरह साफ नहीं है कि किसी संकट के समय बाकी दोनों देश सिर्फ राजनीतिक समर्थन देंगे या फिर सैन्य और रसद सहायता भी मुहैया कराएंगे।
तीनों देशों की अलग ताकत और क्षमताएं
इस त्रिकोणीय समझौते में शामिल तीनों देशों की ताकत और क्षमताएं एक-दूसरे से बिल्कुल अलग हैं, जो इस मंच को और वजन देती हैं। सऊदी अरब के पास अपार आर्थिक और वित्तीय ताकत होने के साथ-साथ इस्लामी दुनिया में बड़ा आध्यात्मिक प्रभाव भी है। दूसरी ओर, तुर्की अपने विकसित रक्षा उद्योग, आधुनिक ड्रोन तकनीक, सैन्य आधुनिकीकरण और नाटो के लंबे अनुभव के साथ इस ढांचे का हिस्सा बना है। वहीं, पाकिस्तान परमाणु शक्ति, अनुभवी सशस्त्र बल और क्षेत्रीय सैन्य अनुभव लेकर इस समझौते में आया है। इस तरह से पूंजी, आधुनिक तकनीक और सैन्य क्षमता का एक अनूठा संगम एक ही मंच पर देखने को मिल रहा है। इन देशों ने साफ किया है कि यह एक पूरी तरह से रक्षात्मक समझौता है जो किसी भी देश के खिलाफ नहीं है, और इसमें दूसरे क्षेत्रीय देशों के लिए भी शामिल होने के रास्ते खुले हैं।
भारत के लिए इस नए समीकरण के क्या हैं मायने
भारत के लिए यह नया मोर्चा सीधे तौर पर किसी खतरे से ज्यादा पाकिस्तान को मिलने वाली अतिरिक्त ताकत की चिंता से जुड़ा है। इस समझौते के जरिए पाकिस्तान को सऊदी अरब की पूंजी और तुर्की की तकनीक का बड़ा सहारा मिल सकता है, जिससे उसका सामरिक आत्मविश्वास बढ़ सकता है। इतिहास में जब-जब पाकिस्तान को बाहरी समर्थन मिला है, तब-तब उसकी सीमा-पार गतिविधियों में आक्रामकता देखी गई है। हालांकि, दूसरी तरफ सऊदी अरब के साथ भारत के रिश्ते बेहद मजबूत और गहरे हैं। ऊर्जा, व्यापार, निवेश और खाड़ी देशों में रहने वाले करोड़ों भारतीयों की मौजूदगी ने दोनों देशों के रिश्तों को नई मजबूती दी है। इसलिए रियाध से भारत के खिलाफ किसी कदम की उम्मीद नहीं की जाती है। तुर्की के रुख में पाकिस्तान के प्रति पुरानी सहानुभूति जरूर रही है, लेकिन भारत के साथ उसके भी बड़े आर्थिक हित जुड़े हुए हैं। इसलिए यह समझौता भारत के खिलाफ कोई सीधा मोर्चा नहीं है, बल्कि देश के रणनीतिक मामलों से जुड़े लोगों के लिए सतर्क रहने का साफ संकेत है।
आगे की चुनौतियां और क्षेत्रीय बदलाव
किसी भी समझौते की असली परीक्षा कागजी घोषणाओं से नहीं, बल्कि संकट के समय उसकी असल कार्रवाई से होती है। यही वजह है कि इसे फौरन 'इस्लामी नाटो' मान लेना जल्दबाजी होगी, लेकिन इसे मामूली घटना समझकर नजरअंदाज करना भी भूल होगी। सऊदी अरब और तुर्की के बीच क्षेत्रीय नेतृत्व को लेकर पुरानी प्रतिस्पर्धा रही है, जबकि पाकिस्तान की खस्ताहाल अर्थव्यवस्था उसकी रणनीतिक आजादी को सीमित करती आई है। आने वाले समय में यह देखना बहुत दिलचस्प होगा कि इन तीनों देशों के साझा हित कितनी दूर तक साथ चल पाते हैं। भारत के लिए इस बदलते दौर में सबसे बड़ी ढाल उसकी अपनी आर्थिक और सैन्य ताकत तथा कूटनीतिक सूझबूझ होगी। भारत को खाड़ी देशों के साथ अपने ऊर्जा, व्यापार और निवेश के रिश्तों को और अधिक मजबूत करना चाहिए। तुर्की के साथ व्यावहारिक संवाद बनाए रखना और पाकिस्तान की किसी भी संभावित नापाक हरकत के खिलाफ अपनी सैन्य तैयारी को पूरी तरह से अडिग रखना भारत की प्राथमिकताओं में शामिल रहना चाहिए। दुनिया तेजी से बदल रही है, इसलिए भारत को अपनी आंतरिक और बाहरी शक्ति इतनी मजबूत रखनी होगी कि कोई भी नया गठबंधन उसके राष्ट्रीय हितों को किसी भी तरह से प्रभावित न कर सके।