Nepal News: नेपाल में महर्षि वाल्मीकि की तपोभूमि तक पहुंचना अब भी है मुश्किल, जानिए पूरी कहानी और इतिहास.

Aanya13 August 20264 min read66 viewsIndia
Nepal News: नेपाल में महर्षि वाल्मीकि की तपोभूमि तक पहुंचना अब भी है मुश्किल, जानिए पूरी कहानी और इतिहास.

नेपाल के चितवन जिले में स्थित महर्षि वाल्मीकि का ऐतिहासिक आश्रम हिंदू धर्म के लोगों के लिए एक बहुत बड़ा और पवित्र तीर्थस्थल है, लेकिन यहां तक पहुंचना आज भी आसान काम नहीं है। रामायण काल से जुड़े इस महत्वपूर्ण स्थान पर पहुंचने के रास्ते में कई तरह की मुश्किलें आती हैं, जिस वजह से श्रद्धालुओं को यात्रा करने में काफी परेशानी उठानी पड़ती है। इस जगह का सीधा संबंध भगवान राम, माता सीता और उनके दोनों पुत्रों लव और कुश से जुड़ा हुआ है, जो इसे हर सनातनी के लिए एक खास जगह बनाता है।

रामायण काल से जुड़ा है इस पवित्र भूमि का पुराना इतिहास

धार्मिक मान्यताओं और रामायण की कथा के अनुसार, जब माता सीता ने अग्निपरीक्षा दी थी, उसके बाद उन्हें यहीं वनवास के लिए भेज दिया गया था। इसी पावन धरती पर लव और कुश का जन्म हुआ था और उनका बचपन यहीं बीता था। उन्होंने महर्षि वाल्मीकि के आश्रम में रहकर ही अपनी पूरी शिक्षा-दीक्षा प्राप्त की थी। इसके अलावा, जब भगवान राम ने अयोध्या में अश्वमेध यज्ञ का आयोजन किया था, तब यज्ञ के छोड़े गए घोड़े को बाल्यावस्था में ही लव और कुश ने पकड़कर इसी स्थान पर रोक लिया था।

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इतिहास के पन्नों को देखें तो 1964 में उत्तर प्रदेश के तत्कालीन इलाहाबाद यानी मौजूदा समय के प्रयागराज में एक धर्म संसद का आयोजन किया गया था। उस बैठक में यह बड़ा निर्णय लिया गया था कि वह पावन स्थान जहां महर्षि वाल्मीकि ने पवित्र रामायण की रचना की थी और माता सीता के त्यागे जाने के बाद लव-कुश का जन्म हुआ था, वह तमसा नदी के किनारे स्थित वाल्मीकि आश्रम नेपाल की सीमा के भीतर ही आता है। इतना ही नहीं, भारत सरकार ने भी गंडक बैराज की डीपीआर में संशोधन करते हुए इस वाल्मीकि आश्रम को नेपाल की सीमा के अंदर ही दर्शाया था।

मंदिर का निर्माण और मुख्य आकर्षण

भगवान राम और माता सीता से जुड़ा होने की वजह से देश-विदेश से आने वाले हिंदू धर्मावलंबी इस आश्रम को बहुत महत्वपूर्ण तीर्थस्थल मानते हैं। इस परिसर के अंदर भगवान राम, माता सीता, महर्षि वाल्मीकि, लव-कुश और हरिहर की मूर्तियों के साथ कई सुंदर मंदिर बनाए गए हैं। यहां के मुख्य मंदिर में स्थापित हरिहर की अष्टधातु की मूर्ति को विशेष और बहुत महत्वपूर्ण माना जाता है। मंदिर के पुजारी रामशरण गिरी के अनुसार, नेपाल के राजा महेंद्र ने विक्रम संवत 2022 में इस आश्रम में खुदाई कराते समय इस मूर्ति को प्राप्त किया था। इसके बाद विक्रम संवत 2028 में तत्कालीन सरकार ने हरिहर की इसी मूर्ति की तस्वीर वाला एक डाक टिकट भी आधिकारिक रूप से जारी किया था।

पुजारी रामशरण गिरी ने यह भी बताया कि राजा महेंद्र ने ही इस जगह पर एक आकर्षक मंदिर का निर्माण करवाया था, मूर्ति की सही से स्थापना कराई थी और पूजा-पाठ की व्यवस्था करने के लिए कुछ परिवारों को यहां लाकर बसाया था। उनके मुताबिक, आज भी इस शांत आश्रम परिसर के अंदर कुल 14 परिवार स्थाई रूप से रह रहे हैं। इतनी प्राचीन और धार्मिक धरोहर होने के साथ-साथ वहां दर्जनों परिवारों के रहने के बावजूद इस पवित्र आश्रम तक पहुंचना आज भी एक कठिन काम बना हुआ है।

आवागमन की परेशानी और हालिया सुधार

यह पूरा ऐतिहासिक वाल्मीकि आश्रम प्रशासनिक रूप से चितवन के माडी क्षेत्र के अंतर्गत आता है, लेकिन भौगोलिक स्थिति के हिसाब से यह पूर्वी नवलपरासी के त्रिवेणी इलाके से बहुत ज्यादा नजदीक पड़ता है। त्रिवेणी में नारायणी नदी को पार करने के बाद लगभग ढाई किलोमीटर की दूरी तय करके इस आश्रम तक आसानी से पहुंचा जा सकता है। एक बहुत बड़ा और महत्वपूर्ण धार्मिक स्थल होने के बावजूद लंबे समय तक यहां तक पहुंचने के लिए कोई अच्छा और पक्का मार्ग नहीं था, जिसकी वजह से यह पूरा क्षेत्र विकास के मामले में काफी समय तक उपेक्षित रहा।

इसी बड़ी समस्या और श्रद्धालुओं की परेशानियों को ध्यान में रखते हुए, आज से करीब चार वर्ष पहले नारायणी नदी के ऊपर एक नए पुल का निर्माण किया गया था। नए साल की शुरुआत, माघ संक्रांति से लेकर माघ अमावस्या तक, महाशिवरात्रि और बड़ी एकादशी जैसे तमाम पवित्र पर्वों के अवसर पर देश-विदेश से बड़ी संख्या में सैलानी और श्रद्धालु इस ऐतिहासिक वाल्मीकि आश्रम तक पहुंचना चाहते हैं। इस बारे में अधिक जानकारी और विस्तृत रिपोर्ट आप हिन्दुस्थान समाचार की आधिकारिक वेबसाइट पर पढ़ सकते हैं।

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