अल-अक्सा मस्जिद पर आगजनी के 57 साल पूरे, फिलिस्तीनी संगठनों ने जताई गहरी चिंता और विरोध.

Sushma Kumari21 August 20264 min read61 viewsWorld
अल-अक्सा मस्जिद पर आगजनी के 57 साल पूरे, फिलिस्तीनी संगठनों ने जताई गहरी चिंता और विरोध.

फिलीस्तीनी और इस्लामी संगठनों ने हाल ही में 21 अगस्त 2026 को पूर्वी यरुत्म में स्थित ऐतिहासिक अल-अक्सा मस्जिद पर हुए 1969 के आगजनी हमले की 57वीं बरसी को बेहद गंभीर माहौल में याद किया। यह पवित्र स्थल आज से ठीक सत्तावन साल पहले 21 अगस्त 1969 को एक ऑस्ट्रेलियाई चरमपंथी डेनिस माइकल रोहान द्वारा लगाई गई आग की चपेट में आ गया था। इस खतरनाक घटना की वजह से अल-किब्ली प्रार्थना हॉल को बहुत ज्यादा नुकसान पहुंचा था और صلاح الدين (सलाह अल-दीन) का ऐतिहासिक मेंबर भी पूरी तरह जलकर खाक हो गया था। उस समय इजरायली अदालत ने आरोपी रोहान को मानसिक बीमारी के कारण आपराधिक रूप से जिम्मेदार नहीं माना था, लेकिन इस घटना ने पूरी दुनिया के मुसलमानों को झकझोर कर रख दिया था और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कड़े कदम उठाने के लिए मजबूर कर दिया था।

अंतरराष्ट्रीय संगठनों का गठन और यूएन का प्रस्ताव

अल-अक्सा मस्जिद पर हुए इस नृशंस हमले के बाद पूरी दुनिया के इस्लामिक देशों में रोष फैल गया था, जिसके परिणामस्वरूप 25 सितंबर 1969 को मोरक्को के रबात शहर में पहला इस्लामिक शिखर सम्मेलन आयोजित किया गया था। इसी सम्मेलन के दौरान ऑर्गेनाइजेशन ऑफ इस्लामिक कोऑपरेशन (OIC) की स्थापना की गई थी ताकि इस्लामिक पवित्र स्थलों की सुरक्षा और उनके अधिकारों की रक्षा की जा सके। इसके अलावा, संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद ने भी इस मामले में कड़ा रुख अपनाते हुए 15 सितंबर 1969 को संकल्प संख्या 271 को अपनाया था जिसमें इस घृणित कृत्य को पवित्र स्थल की बेअदबी करार देते हुए कड़ी निंदा की गई थी। इतने साल बीत जाने के बाद भी यह ऐतिहासिक घाव फिलिस्तीनियों के दिलों में आज भी ताजा बना हुआ है और वे हर साल इस दिन को अपनी ऐतिहासिक विरासत की रक्षा के संकल्प के रूप में मनाते हैं।

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मौजूदा नीतियां और इजरायली प्रतिबंधों पर चिंता

इस 57वीं बरसी के अवसर पर 21 अगस्त 2026 को फिलिस्तीनी समूहों ने मौजूदा इजरायली नीतियों पर अपनी गहरी चिंता खुलकर जाहिर की है। हमास संगठन ने हाल ही में इजरायल द्वारा उठाए गए उन कदमों की कड़ी आलोचना की है जिनमें परिसर के भीतर संगठित प्रार्थनाओं की अनुमति दी गई है और यहूदी प्रार्थना पुस्तकों को अंदर ले जाने दिया जा रहा है। फिलिस्तीनी नेतृत्व का साफ तौर पर कहना है कि यह सब उस पवित्र स्थल के इस्लामी स्वरूप को बदलने और उसे पूरी तरह से यहूदी बनाने की एक सोची-समझी साजिश का हिस्सा है। ये बढ़ती हुई टेंशन उस अवधि के ठीक बाद सामने आई है जब इस मस्जिद को मुस्लिम नमाजियों के लिए लगातार 40 दिनों तक यानी 28 फरवरी से 9 अप्रैल 2026 के बीच बंद रखा गया था, जो साल 1967 के बाद से अब तक की सबसे लंबी बंदी मानी जा रही है।

मंत्रियों के फैसलों पर तीखी प्रतिक्रिया

इजरायल के नेशनल सिक्योरिटी मिनिस्टर इतामार बेन-गवीर को 144-डुनम में फैले इस विशाल परिसर के भीतर धार्मिक अनुष्ठानों और सार्वजनिक प्रार्थनाओं की अनुमति देने वाले अपने फैसलों की वजह से लगातार आलोचनाओं और कड़ी जांच का सामना करना पड़ रहा है। फिलिस्तीनी प्रेसीडेंसी और फिलिस्तीनी नेशनल काउंसिल जैसे बड़े आधिकारिक निकायों ने चेतावनी दी है कि इस तरह की गतिविधियां इस पवित्र स्थल पर जबरन अस्थायी और स्थानिक विभाजन थोपने का एक सुनियोजित प्रोजेक्ट हैं। इसके साथ ही, ओआईसी के महासचिव हुसैन इब्राहिम ताहा ने एक बार फिर दोहराया है कि यरुशलम आज भी स्वतंत्र फिलिस्तीनी राज्य की राजधानी है और उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि साल 1967 से कब्जाए गए इन पवित्र स्थलों पर इजरायल का कोई भी संप्रभु अधिकार नहीं बनता है।

गाजा में हुए बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन

फिलीस्तीनी अल-अहरार मूवमेंट ने 1969 की इस आग की घटना को यरुशलम में फिलिस्तीनी वजूद को मिटाने के लिए चलाए जा रहे एक बड़े और लंबे अभियान की ही शुरुआती कड़ी बताया है। इन तमाम हालात और लगातार बढ़ते तनाव के जवाब में, फिलिस्तीनियों ने 21 अगस्त 2026 को गाजा में बड़ी संख्या में सड़कों पर उतरकर शांतिपूर्ण रैलियां निकालीं और अपनी इस ऐतिहासिक मस्जिद की हिफाजत के लिए अपना अटूट समर्थन दुनिया के सामने दर्ज कराया। आम लोगों से लेकर बड़े संगठनों तक, हर कोई इस बात को लेकर फिक्रमंद है कि अगर इन पवित्र स्थलों की सुरक्षा के साथ इसी तरह खिलवाड़ होता रहा, तो क्षेत्रीय शांति को और अधिक गंभीर खतरे का सामना करना पड़ सकता है।

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