दिल्ली उच्च न्यायालय ने राष्ट्रीय राजधानी के निजी स्कूलों को एक महत्वपूर्ण निर्देश जारी किया है। कोर्ट ने स्पष्ट कहा है कि निजी स्कूल अपने शिक्षकों को सातवें वेतन आयोग के अनुसार तनख्वाह दें। यदि स्कूल इस आदेश का पालन नहीं करते हैं, तो उन्हें दिल्ली सरकार के अधीन भेजा जा सकता है। न्यायमूर्ति सुरेश कैत और न्यायमूर्ति गिरीश कठपालिया की पीठ ने आदेश के पालन के लिए 21 अगस्त को एक रिपोर्ट तलब की है।

 

स्कूलों की आर्थिक स्थिति पर उच्च न्यायालय की टिप्पणी

स्कूलों की ओर से कहा गया कि वे एक जनवरी 2016 से काया राशि का 24 प्रतिशत जमा नहीं कर पा रहे हैं और उनकी आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं है। शिक्षा निदेशालय फीस वृद्धि की अनुमति नहीं दे रहा है, जिससे उनकी स्थिति और भी खराब हो रही है। कोर्ट ने इस पर टिप्पणी की कि भले ही फीस वृद्धि की अनुमति दी जाए, तब भी शिक्षकों के वेतन की बकाया राशि इतनी है कि वर्तमान फीस को चार गुना बढ़ाने पर भी इसकी पूर्ति नहीं होगी।

शिक्षकों की याचिका पर कोर्ट का रुख

साल 2006 में छठे वेतन आयोग और 2016 से सातवें वेतन आयोग के प्रावधानों के अनुसार तनख्वाह की मांग करते हुए 66 शिक्षकों ने वरिष्ठ अधिवक्ता अशोक अग्रवाल के माध्यम से दिल्ली उच्च न्यायालय में याचिका दायर की थी। उन्होंने कहा कि वर्तमान में उन्हें छठे वेतन आयोग के अनुसार वेतन मिल रहा है और उन्हें दिल्ली सरकार के स्कूलों में काम करने वाले शिक्षकों के समान वेतन, भत्ते और डीए मिलना चाहिए।

 

अगली सुनवाई और संबंधित स्कूल

हाईकोर्ट ने आदेश जारी करते हुए जीडी गोयनका पब्लिक स्कूल, सेंट मार्गरेट सीनियर सेकेंडरी स्कूल और डीएवी पब्लिक स्कूल सहित कई अन्य स्कूलों को शामिल किया है। 21 अगस्त को इस मामले की अगली सुनवाई होगी।

 

अन्य शिक्षक भी उठा सकते हैं लाभ

वरिष्ठ अधिवक्ता अशोक अग्रवाल का कहना है कि इस आदेश का लाभ अन्य निजी स्कूलों में काम करने वाले शिक्षक भी उठा सकते हैं, जो कम वेतन पर काम कर रहे हैं। वे भी उच्च न्यायालय में जाकर या स्कूल प्रशासन के साथ अपना पक्ष रख सकते हैं।

 

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