Cox's Bazar में रोहिंग्या शरणार्थियों ने की न्याय की मांग, म्यांमार नरसंहार के पूरे हुए नौ साल.

25 अगस्त 2026 को कॉक्स बाजार के शरणार्थी शिविरों में हजारों रोहिंग्या शरणार्थियों ने म्यांमार में हुए नरसंहार के नौ साल पूरे होने पर बड़े पैमाने पर रैलियां निकालीं। प्रदर्शनकारियों ने अपनी सुरक्षा, सम्मान के साथ घर वापसी, नागरिकता और रखाइन राज्य में घूमने की आजादी तथा आजीविका के बुनियादी अधिकारों को बहाल करने की जोरदार मांग की। शरणार्थियों का यह दर्द साफ दिखाता है कि इतने साल बीत जाने के बाद भी उनकी मुश्किलें कम होने का नाम नहीं ले रही हैं और वे आज भी अपने बुनियादी अधिकारों के लिए संघर्ष कर रहे हैं।
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चिंता और राजनयिकों का बयान
ढाका में यूके, ऑस्ट्रेलिया, कनाडा और यूरोपीय संघ के प्रतिनिधियों सहित 16 राजनयिक मिशनों ने इस बरसी पर एक संयुक्त बयान जारी किया। इन मिशनों ने कहा कि रोहिंग्या लोगों का अपने घर वापस जाना बहुत जरूरी है, लेकिन रखाइन राज्य के मौजूदा हालात अभी भी सुरक्षित और सम्मानजनक वापसी के लिए ठीक नहीं हैं। वहां लगातार हवाई हमले हो रहे हैं, राहत सामग्री रोकी जा रही है और हिंसा बढ़ती जा रही है, जिससे स्थिति बेहद खराब बनी हुई है।
इस संकट को हल करने के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर लगातार प्रयास किए जा रहे हैं। संयुक्त राष्ट्र के महासचिव एंटीगुओ गुटेरेस ने दुनिया का ध्यान इस मानवीय संकट की ओर आकर्षित किया है। इसके अलावा, जांच तंत्र के प्रमुख निकोलस कौमजियन ने शरणार्थियों की वापसी की रणनीतियों पर चर्चा करने के लिए कॉक्स बाजार में एक हितधारक संवाद में हिस्सा लिया। वहीं, अंतरराष्ट्रीय न्यायालय यानी ICJ में इस नरसंहार के मामले पर जनवरी 2026 में सुनवाई हुई थी और इसका अंतिम फैसला अभी आना बाकी है।
बांग्लादेश सरकार और म्यांमार का रुख
बांग्लादेश सरकार शांतिपूर्ण समाधान खोजने के लिए लगातार काम कर रही है और इसके लिए प्रधानमंत्री के नेतृत्व में 12 जुलाई 2026 को एक उच्च स्तरीय राष्ट्रीय समिति भी बनाई गई है। अधिकारियों ने साफ कहा है कि किसी भी शरणार्थी को जबरन वापस नहीं भेजा जाएगा। इसके विपरीत, म्यांमार की सेना समर्थित सरकार ने 14 अगस्त 2026 को दावा किया था कि उसने 300,000 से अधिक शरणार्थियों को पूर्व निवासियों के रूप में सत्यापित कर लिया है और सुरक्षा में सुधार होने पर उन्हें वापस लेने के लिए तैयार है। हालांकि, इन दावों पर संदेह जताया जा रहा है क्योंकि म्यांमार आज भी 'रोहिंग्या' शब्द को मान्यता नहीं देता है और उन्हें 'बंगाली' कहता है।
भोजन सहायता में कटौती और बढ़ती मुश्किलें
जैसे-जैसे यह संकट अपने नौवें वर्ष में प्रवेश कर रहा है, कॉक्स बाजार की स्थिति दिन-प्रतिदिन तनावपूर्ण होती जा रही है। वर्ष 2026 की संयुक्त प्रतिक्रिया योजना को भारी फंड की कमी का सामना करना पड़ रहा है। इस वजह से विश्व खाद्य कार्यक्रम को कमजोर परिवारों के लिए खाद्य सहायता में कटौती करनी पड़ी है, जिससे शरणार्थियों और स्थानीय मेजबान समुदायों दोनों की परेशानियां और अधिक बढ़ गई हैं। इस पूरी स्थिति की विस्तृत जानकारी आप DFAT Media Release पर देख सकते हैं।