रूस ने अमेरिका और इजरायल से आधिकारिक तौर पर मांग की है कि वे ईरान पर अपने सैन्य हमले तुरंत रोक दें और बातचीत के जरिए मामले को सुलझाएं। 12 मार्च 2026 को इस युद्ध का 13वां दिन है। ईरान की तरफ से दी गई आधिकारिक जानकारी के अनुसार, इस संघर्ष में अब तक 1,348 आम नागरिकों की जान जा चुकी है और 17,000 से ज्यादा लोग घायल हुए हैं। हालात लगातार बिगड़ रहे हैं और इससे पूरे मिडिल ईस्ट में बड़ा संकट पैदा हो गया है।

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खाड़ी देशों में रहने वाले प्रवासियों पर क्या असर हो रहा है?

ईरान और अमेरिका-इजरायल के बीच चल रहे इस युद्ध का सीधा असर खाड़ी देशों पर भी पड़ रहा है। जो भारतीय या अन्य प्रवासी दुबई और कुवैत में रहते हैं या वहां लगातार सफर करते हैं, उनके लिए इस स्थिति को समझना जरूरी है।

  • दुबई इंटरनेशनल एयरपोर्ट (Dubai International Airport) और कुवैत इंटरनेशनल एयरपोर्ट के पास ड्रोन और मिसाइल गिरने की घटनाएं सामने आई हैं, जिससे वहां कुछ बुनियादी नुकसान हुआ है।
  • युद्ध के कारण अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल के पार चली गई हैं।
  • यूनिसेफ के अनुसार इलाके में हालात काफी खराब हो गए हैं और उड़ानों की सुरक्षा पर भी इसका असर पड़ रहा है।

युद्ध रोकने के लिए ईरान की क्या हैं शर्तें?

ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन ने शांति और युद्ध रोकने के लिए तीन मुख्य शर्तें सामने रखी हैं। इन शर्तों पर सहमति बनने के बाद ही बातचीत आगे बढ़ने की उम्मीद है।

  • तेहरान के कानूनी अधिकारों को पूरी तरह से मान्यता दी जाए।
  • सैन्य हमलों में जो भी नुकसान हुआ है, उसका हर्जाना या मुआवजा अमेरिका और इजरायल द्वारा दिया जाए।
  • भविष्य में ऐसे सैन्य हमले फिर से नहीं होंगे, इसकी सख्त अंतरराष्ट्रीय स्तर पर गारंटी दी जाए।

UN और रूस का इस मामले पर क्या कहना है?

रूस के विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव ने इन हमलों को कूटनीति के खिलाफ बताया है। संयुक्त राष्ट्र में रूस के राजदूत ने भी साफ कहा है कि अमेरिका और इजरायल के ऑपरेशन यूएन चार्टर का सीधा उल्लंघन करते हैं। उनका मानना है कि इससे पूरे मिडिल ईस्ट में एक बड़ी तबाही आ सकती है।

वहीं संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) ने 11 मार्च को प्रस्ताव 2817 पास किया है। इस प्रस्ताव में ईरान द्वारा खाड़ी देशों पर किए जा रहे जवाबी हमलों को तुरंत रोकने के लिए कहा गया है। हालांकि, इसमें अमेरिका और इजरायल के हमलों को रोकने का कोई आदेश शामिल नहीं है। इसी कारण रूस और चीन ने इस वोटिंग से खुद को अलग रखा।