Dubai में रह रहे भारतीय कारोबारी सतीश सनपाल को जबलपुर हाई कोर्ट से झटका, वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग से बयान देने की मांग खारिज.

मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय की जबलपुर स्थित मुख्य पीठ ने दुबई में रह रहे भारतीय कारोबारी सतीश सनपाल को बड़ा झटका दिया है। अदालत ने उनकी रिट याचिका को पूरी तरह से खारिज कर दिया है, जिसमें उन्होंने भारत आए बिना वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से जांच में शामिल होने और अपने बयान दर्ज कराने की अनुमति मांगी थी। इस फैसले से गल्फ देशों में रहने वाले उन कारोबारियों को भी बड़ा संदेश मिला है जो कानूनी मामलों में व्यक्तिगत रूप से पेश होने से बचना चाहते हैं।
क्या है पूरा मामला और क्यों दर्ज हुई थी एफआईआर
यह पूरा कानूनी मामला मध्य प्रदेश के जबलपुर शहर के लॉर्डगंज थाने में दर्ज अपराध क्रमांक 441/2022 से जुड़ा हुआ है। इस मामले में पुलिस ने जुआ अधिनियम की धारा 4-ए के साथ-साथ भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 109 और 34 के तहत केस दर्ज किया था। कारोबारी सतीश सनपाल का यह दावा था कि इस शुरुआती एफआईआर में उनका नाम सीधे तौर पर शामिल नहीं किया गया था, लेकिन पुलिस लगातार उन तक पहुंचने की कोशिश कर रही थी।
कारोबारी सतीश सनपाल पिछले करीब आठ वर्षों से संयुक्त अरब अमीरात यानी UAE के दुबई शहर में रहकर अपना कारोबार संभाल रहे हैं। उनके वकीलों की तरफ से कोर्ट में यह दलील दी गई थी कि वह वर्ष 2020 के बाद से किसी भी1 कारण से भारत वापस नहीं आए हैं। पुलिस द्वारा जांच में शामिल होने के लिए लगातार नोटिस जारी किए जा रहे थे, जिसके जवाब में उनके वकील ने वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए पेश होने की गुहार लगाई थी।
अदालत ने क्या दी दलील और क्यों खारिज की याचिका
न्यायमूर्ति हिमांशु जोशी ने इस मामले में मंगलवार को अपना फैसला सुनाते हुए साफ कर दिया कि कोई भी आरोपी अपनी सुविधा के अनुसार जांच की प्रक्रिया खुद तय नहीं कर सकता है। अदालत ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि किसी भी मामले में जांच का सही तरीका क्या होगा, यह पूरी तरह से जांच एजेंसी के अधिकार क्षेत्र में आता है। सनपाल की ओर से वकील विपिन यादव ने भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 180(3) और 530 का हवाला देते हुए ऑडियो-वीडियो माध्यम से बयान दर्ज करने की अनुमति मांगी थी, जिसे कोर्ट ने मानने से इनकार कर दिया।
इसके साथ ही उच्च न्यायालय ने लॉर्डगंज थाने में दर्ज एफआईआर को पूरी तरह से रद्द करने की मांग को भी ठुकरा दिया। अदालत का कहना था कि इस पूरे प्रकरण में गंभीर संज्ञेय अपराध के आरोप शामिल हैं और पुलिस की जांच अभी भी चालू है। ऐसे शुरुआती स्तर पर किसी भी एफआईआर को अचानक निरस्त करने का कोई ठोस कानूनी आधार नहीं बनता है। इस मामले में राज्य सरकार की तरफ से अतिरिक्त महाधिवक्ता बीडी सिंह ने अदालत में पक्ष रखा था और दोनों पक्षों की लंबी दलीलों के बाद 29 जुलाई को सुनवाई पूरी होने पर फैसला सुरक्षित रख लिया गया था जिसे अब सुनाया गया है।