सऊदी अरब ने COP16 में हासिल की बड़ी सफलता, जुटाए 12 अरब डॉलर से ज्यादा

Praggya Singh sabal17 August 20262 min read60 viewsSaudi
सऊदी अरब ने COP16 में हासिल की बड़ी सफलता, जुटाए 12 अरब डॉलर से ज्यादा

सऊदी अरब ने हाल ही में संयुक्त राष्ट्र मरुस्थलीकरण रोकथाम कन्वेंशन के तहत 16वें कॉन्फ्रेंस ऑफ द पार्टीज (COP16) की अपनी दो साल की अध्यक्षता सफलतापूर्वक पूरी कर ली है। इस दौरान देश ने जमीन के खराब होने की समस्या से निपटने के लिए 12 अरब डॉलर से अधिक की आर्थिक मदद जुटाई है। रियाद में हुए इस बड़े सम्मेलन में दुनिया भर से लोगों ने हिस्सा लिया और पर्यावरण को बचाने के लिए कई महत्वपूर्ण फैसले लिए गए। इस आयोजन ने वैश्विक स्तर पर पर्यावरण सुरक्षा के क्षेत्र में एक नया इतिहास रच दिया है।

रियाद सम्मेलन में दिखा अभूतपूर्व उत्साह

रियाद में आयोजित इस ऐतिहासिक सम्मेलन में 170 देशों के 1,00,000 से अधिक लोगों ने हिस्सा लिया। इन पांच दिनों के दौरान कुल 820 कार्यक्रम आयोजित किए गए, जिसमें दुनिया भर के बड़े नेताओं और पर्यावरणविदों ने अपनी बात रखी। इस दौरान रियाद ग्लोबल ड्राउट रेजिलिएंस पार्टनरशिप की शुरुआत की गई, जिसके लिए 2 अरब डॉलर जुटाए गए। इसके अलावा धूल भरी आंधियों और सूखे से समय रहते निपटने के लिए एक अंतरराष्ट्रीय पहल की भी शुरुआत की गई।

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पर्यावरण सुधार के लिए सौ से ज्यादा नई पहल

सम्मेलन के दौरान रियाद एक्शन एजेंडा का दायरा बढ़ाकर उसमें कुल 100 पहलों को शामिल किया गया। इन सभी पहलों का मुख्य उद्देश्य जंगलों, घास के मैदानों और खेती की खराब हो चुकी जमीन को दोबारा उपजाऊ बनाना है। सऊदी अधिकारियों ने बताया कि इस दो साल के कार्यकाल में निजी कंपनियों ने भी बहुत बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया, जो कि अपने आप में एक बड़ा रिकॉर्ड है। ग्रीन जोन की सफलता ने यह साबित कर दिया कि अगर सही दिशा में काम किया जाए तो आम लोग और कंपनियां भी पर्यावरण बचाने के लिए आगे आते हैं।

मंगोलिया को सौंपी गई अब जिम्मेदारी

सऊदी अरब ने अपनी अध्यक्षता अब मंगोलिया को सौंप दी है, लेकिन अधिकारियों का कहना है कि यह किसी काम का अंत नहीं बल्कि पर्यावरण बचाने के प्रयासों को आगे बढ़ाने का सिलसिला है। वर्तमान में मंगोलिया की राजधानी उलानबटार में चल रही बैठकों में भी सऊदी अधिकारी लगातार हिस्सा ले रहे हैं और अपने पवेलियन के जरिए अलग-अलग कार्यक्रमों का आयोजन कर रहे हैं। इस पूरी प्रक्रिया का असर यह हुआ है कि अब मरुस्थलीकरण और सूखे की समस्या को दुनिया भर के एजेंडे में सबसे ऊपर रखा जाने लगा है।

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