अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव के बीच सऊदी अरब ने अपना रुख पूरी तरह साफ कर दिया है। सऊदी सरकार ने दो टूक शब्दों में कहा है कि वह अपने हवाई क्षेत्र (airspace) का इस्तेमाल किसी भी हमले या सैन्य ऑपरेशन के लिए नहीं होने देगा। सऊदी अरब इस वक्त शांति चाहता है और युद्ध खत्म कराने के लिए पाकिस्तान की कोशिशों का पूरा समर्थन कर रहा है।
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सऊदी अरब ने हवाई क्षेत्र को लेकर क्या कहा?
- आधिकारिक इनकार: 8 मई 2026 को सऊदी अरब ने साफ़ किया कि उसने अपनी हवाई सीमा का इस्तेमाल किसी भी आक्रामक सैन्य कार्रवाई के लिए नहीं होने दिया है।
- भ्रामक खबरों पर चेतावनी: सऊदी सरकार का कहना है कि कुछ लोग जानबूझकर सऊदी की स्थिति के बारे में गलत खबरें फैला रहे हैं।
- अधिकारी का बयान: सऊदी के डिप्टी फॉरेन मिनिस्टर रायेद क्रीमली ने X (ट्विटर) पर लोगों से अपील की कि वे बिना किसी पुख्ता जानकारी वाले स्रोतों पर भरोसा न करें।
- पुरानी प्रतिबद्धता: इससे पहले 28 जनवरी 2026 को क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान ने भी कहा था कि ईरान के खिलाफ किसी भी सैन्य कार्रवाई के लिए सऊदी की ज़मीन या आसमान का इस्तेमाल नहीं होगा।
पाकिस्तान की भूमिका और क्षेत्रीय तनाव का क्या असर है?
इस पूरे विवाद में पाकिस्तान एक मध्यस्थ (mediator) के तौर पर काम कर रहा है। पाकिस्तान अमेरिका और ईरान के बीच बातचीत कराकर युद्ध को रोकने और युद्धविराम (ceasefire) करवाने की कोशिश कर रहा है। पाकिस्तान के कुछ फाइटर जेट और सैन्य दल सऊदी अरब में पहले से मौजूद हैं, जो दोनों देशों के बीच रक्षा समझौते का हिस्सा हैं।
दूसरी तरफ, अमेरिका ने ‘प्रोजेक्ट फ्रीडम’ के जरिए हॉर्मुज़ जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) में अपने जहाजों की सुरक्षा बढ़ाई है। वहीं ईरान ने अपना एक ‘पर्शियन गल्फ स्ट्रेट अथॉरिटी’ बनाया है ताकि वह जहाजों के आने-जाने और टैक्स पर नियंत्रण रख सके। इसी तनाव के बीच सऊदी अरब और जापान ने 8 मई को ऊर्जा सुरक्षा (energy security) के लिए एक टास्क फोर्स बनाने पर सहमति जताई है।
Frequently Asked Questions (FAQs)
सऊदी अरब ने अमेरिकी सैन्य ऑपरेशन्स पर क्या स्टैंड लिया है?
सऊदी अरब ने 8 मई 2026 को स्पष्ट किया कि उसने किसी भी आक्रामक सैन्य अभियान के लिए अपने हवाई क्षेत्र (airspace) का उपयोग करने की अनुमति नहीं दी है।
इस विवाद में पाकिस्तान क्या भूमिका निभा रहा है?
पाकिस्तान अमेरिका और ईरान के बीच मध्यस्थता कर रहा है ताकि बातचीत के जरिए युद्ध को खत्म किया जा सके और एक स्थायी समझौता हो सके।