सऊदी अरब न्यू न्यूक्लियर डील: अमेरिका ने कांग्रेस को भेजा 30 साल का समझौता, इस शर्त पर टिकी बात.

Nura Basta26 August 20262 min read60 viewsSaudi
सऊदी अरब न्यू न्यूक्लियर डील: अमेरिका ने कांग्रेस को भेजा 30 साल का समझौता, इस शर्त पर टिकी बात.

अमेेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump ने सऊदी अरब के साथ एक बड़े नागरिक परमाणु सहयोग समझौते को आधिकारिक रूप से अमेरिकी कांग्रेस के पास समीक्षा के लिए भेज दिया है। यह समझौता कुल 30 साल के लिए तय किया गया है, जिसे लेकर दोनों देशों के बीच लंबे समय से बातचीत चल रही थी। इस प्रस्ताव के सामने आने के बाद से ही राजनीतिक गलियारों में चर्चा तेज हो गई है कि आने वाले दिनों में पश्चिम एशिया की राजनीति पर इसका क्या असर पड़ेगा।

समझौते की मुख्य बातें और शर्तें

मूल रूप से इस समझौते पर जुलाई 2026 में अमेरिकी ऊर्जा सचिव Chris Wright और सऊदी ऊर्जा मंत्री Prince Abdulaziz bin Salman ने हस्ताक्षर किए थे। इसके बाद इस दस्तावेज को विधिवत रूप से सोमवार, 24 अगस्त 2026 को अमेरिकी कानून निर्माताओं के पास सौंपा गया। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने स्पष्ट किया है कि इस डील के आगे बढ़ने के लिए एक बहुत बड़ी शर्त पूरी करनी होगी। उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ट्रुथ सोशल के जरिए यह बात रखी कि यह समझौता तभी आगे बढ़ेगा जब सऊदी अरब Abraham Accords का हिस्सा बनेगा और इस्राइल के साथ अपने कूटनीतिक रिश्तों को सामान्य करेगा।

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शुरुआती दस्तावेजों में यह शर्त शामिल नहीं थी, लेकिन राष्ट्रपति ट्रम्प ने अब इसे अनिवार्य कर दिया है। इसके साथ ही इस डील में इस बात की भी सख्त मनाही है कि सऊदी अरब में किसी भी तरह से यूरेनियम का संवर्धन किया जाएगा। इस 30-year फ्रेमवर्क का मुख्य उद्देश्य अमेरिकी कंपनियों को सऊदी अरब में नागरिक परमाणु तकनीक का निर्यात करने की अनुमति देना है। इसमें वेस्टिंगहाउस जैसी बड़ी कंपनियां भी शामिल हैं, जो केमेको और ब्रुकफील्ड एसेट मैनेजमेंट के स्वामित्व वाली संयुक्त कंपनी है। अमेरिकी ऊर्जा सचिव का मानना है कि इससे अमेरिकी परमाणु उद्योग को भारी आर्थिक फायदा पहुंचेगा और अरबों डॉलर का कारोबार होगा।

अमेरिकी संसद में होगी चर्चा और आगे की प्रक्रिया

अमेरिकी परमाणु ऊर्जा अधिनियम के नियमों के अनुसार अब कांग्रेस के पास इस प्रस्ताव का मूल्यांकन करने के लिए 90 session days का समय है। इस दौरान देश के कानून निर्माताओं के बीच इस बात पर तीखी बहस होने की पूरी उम्मीद है कि अमेरिकी परमाणु सेक्टर के विस्तार और पश्चिम एशिया में हथियारों के प्रसार को रोकने के बीच कैसे संतुलन बनाया जाए। दूसरी ओर, सऊदी अरब का यह रुख रहा है कि इस्राइल को आधिकारिक मान्यता देना एक स्वतंत्र फिलिस्तीनी राज्य के गठन के लिए एक विश्वसनीय रास्ते पर निर्भर करता है। हालांकि, इस नवीनतम सबमिशन पर अभी तक वाशिंगटन स्थित सऊदी दूतावास की तरफ से कोई आधिकारिक बयान सामने नहीं आया है। इस पूरी प्रक्रिया की विस्तृत जानकारी के लिए आप ANI News पर जा सकते हैं।

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