अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump ने 23 जुलाई 2026 को घोषणा की कि सऊदी अरब के साथ हुआ नागरिक परमाणु सहयोग समझौता अब पूरी तरह से इस बात पर टिका है कि सऊदी अरब Abraham Accords का हिस्सा बने। उन्होंने कहा कि मध्य पूर्व के भविष्य के लिए इस क्षेत्रीय शांति समझौते में शामिल होना बहुत जरूरी है। व्हाइट हाउस की प्रेस सचिव Karoline Leavitt ने साफ किया कि अगर सऊदी अरब इस शर्त को नहीं मानता है तो यह डील रद्द मानी जाएगी।

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परमाणु समझौते की शर्तें और विवाद

सऊदी अरब और अमेरिका के बीच 22 जुलाई 2026 को यह 123 समझौता हुआ था। इस डील के तहत 30 साल तक सहयोग करने की योजना है, जिसमें यूरेनियम संवर्धन संयंत्र की आर्थिक व्यवहार्यता की जांच के लिए 2 साल का अध्ययन शामिल है। राष्ट्रपति ट्रंप ने दावा किया कि इस समझौते में सामग्री के संवर्धन की कोई गुंजाइश नहीं है और यह शर्त पहले से ही स्पष्ट थी। हालांकि, एक सऊदी अधिकारी ने इस दावे पर आपत्ति जताई है और कहा कि समझौता पहले ही साइन हो चुका है, इसलिए इसमें दोबारा बातचीत की कोई गुंजाइश नहीं है।

चिंताएं और चुनौतियां

अमेरिकी विदेश मंत्री Marco Rubio ने बताया कि इस समझौते का मकसद सऊदी अरब को चीन या रूस जैसे देशों के बजाय अमेरिका के साथ काम करने के लिए प्रेरित करना है। वहीं, परमाणु हथियारों के जानकारों ने चिंता जताई है कि इस डील में परमाणु हथियारों के प्रसार को रोकने के लिए पर्याप्त कड़े नियम नहीं हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि इसमें International Atomic Energy Agency के अतिरिक्त प्रोटोकॉल को अनिवार्य नहीं किया गया है, जिससे क्षेत्र में परमाणु हथियारों की दौड़ शुरू होने का खतरा बना रह सकता है। अब यह समझौता 90 दिनों की कांग्रेस समीक्षा प्रक्रिया से गुजरेगा।

Praggya Singh sabal

Journalist from Noida. Covering Delhi, NCR and National Updates.