ट्रम्प प्रशासन सऊदी अरब के साथ एक नया परमाणु सहयोग समझौता करने की तैयारी में है। यह समझौता आने वाले कुछ दिनों में कांग्रेस के सामने पेश किया जाएगा। इस करार की सबसे बड़ी बात यह है कि इसमें अंतरराष्ट्रीय स्तर पर माने जाने वाले परमाणु सुरक्षा मानकों को शामिल नहीं किया गया है, जो आमतौर पर परमाणु हथियारों के विकास को रोकने के लिए जरूरी होते हैं।
समझौते से जुड़ी अहम जानकारी
यह समझौता अक्टूबर 2025 में तय हुआ था, जिस पर U.S. Energy Secretary Chris Wright और Saudi Minister of Energy Abdulaziz bin Salman ने हस्ताक्षर किए थे। इस डील में अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी यानी IAEA के Additional Protocol को शामिल नहीं किया गया है। इसे अमेरिका के अब तक के परमाणु समझौतों में बेहद अलग माना जा रहा है। साल 2009 में UAE के साथ हुए समझौते को ‘गोल्ड स्टैंडर्ड’ माना जाता था, जिसमें UAE ने परमाणु ईंधन को फिर से प्रोसेस करने की क्षमता को छोड़ने का फैसला किया था, लेकिन सऊदी अरब के मामले में ऐसा नहीं है।
हथियारों के विकास का डर
सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस Mohammed bin Salman पहले ही कह चुके हैं कि अगर ईरान परमाणु हथियार बनाता है, तो सऊदी अरब भी ऐसा ही करेगा। वहीं, ऊर्जा मंत्री Prince Abdulaziz bin Salman ने पिछले साल यूरेनियम के इस्तेमाल और उसे एनरिच करने की बात कही थी। विशेषज्ञों का मानना है कि इस डील के जरिए सऊदी अरब को सुरक्षा के कड़े नियमों के बिना परमाणु हथियारों तक पहुंचने का रास्ता मिल सकता है। कांग्रेस में इस समझौते को लेकर काफी विरोध होने की संभावना है, क्योंकि कई लोग सुरक्षा नियमों में ढील दिए जाने से चिंतित हैं।
