Saudi Arabia Defence Deal: सऊदी अरब, पाकिस्तान और तुर्किये के बीच बड़ा रक्षा समझौता, एक देश पर हमला हुआ तो तीनों मिलकर देंगे जवाब.

Aanya10 August 20264 min read58 viewsSaudi
Saudi Arabia Defence Deal: सऊदी अरब, पाकिस्तान और तुर्किये के बीच बड़ा रक्षा समझौता, एक देश पर हमला हुआ तो तीनों मिलकर देंगे जवाब.

पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव और सुरक्षा की चिंताओं के बीच एक बहुत बड़ा और अहम घटनाक्रम सामने आया है जहाँ सऊदी अरब, पाकिस्तान और तुर्किये ने मिलकर एक ऐतिहासिक रक्षा समझौते पर हस्ताक्षर किए हैं। इस नए समझौते के तहत अब यदि इनमें से किसी भी एक देश पर कोई बाहरी हमला होता है तो उसे तीनों देशों पर हमला माना जाएगा और तीनों मिलकर उसका करारा जवाब देंगे। मक्का में आयोजित एक उच्चस्तरीय शिखर सम्मेलन के दौरान यह बड़ा फैसला लिया गया है जिससे पूरी दुनिया की नजरें इस त्रिपक्षीय गठबंधन पर टिक गई हैं। इस कदम से क्षेत्रीय सुरक्षा और रक्षा सहयोग को एक नई दिशा मिलने की पूरी उम्मीद जताई जा रही है।

मक्का शिखर सम्मेलन में हुआ ऐतिहासिक समझौता

07 अगस्त को मक्का अल-मुकर्रमा शिखर सम्मेलन के दौरान यह त्रिपक्षीय रक्षा समझौता हुआ जिसे मक्का संयुक्त रक्षा समझौता नाम दिया गया है। तुर्किये की सरकारी समाचार एजेंसी अनाडोलू और अन्य मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार इस महत्वपूर्ण बैठक का आयोजन सऊदी अरब के सुल्तान सलमान बिन अब्दुलअज़ीज़ अल सऊद के विशेष निमंत्रण पर किया गया था। इस सम्मेलन में तुर्किये के राष्ट्रपति रेचेप तैयप एर्दोगन और पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज़ शरीफ ने विशेष रूप से शिरकत की। सऊदी अरब के युवराज एवं प्रधानमंत्री मोहम्मद बिन सलमान ने मक्का स्थित अल-सफा पैलेस में दोनों विदेशी मेहमानों का गर्मजोशी से स्वागत किया और इसके बाद बंद कमरे में कई अहम मुद्दों पर लंबी चर्चा हुई।

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बैठक के दौरान तीनों देशों के शीर्ष नेताओं ने आपसी संबंधों, क्षेत्रीय सुरक्षा चुनौतियों, रक्षा सहयोग को बढ़ावा देने और साझा रणनीतिक हितों पर विस्तार से बातचीत की। ऐतिहासिक संबंधों और इस्लामी एकजुटता को मजबूत आधार बनाते हुए अंततः इस बड़े रक्षा समझौते पर मुहर लगाई गई। समझौते की सबसे खास बात यह है कि तीनों देश अपनी सामूहिक सुरक्षा व्यवस्था को और अधिक मजबूत करेंगे। इसके साथ ही क्षेत्रीय और वैश्विक स्तर पर शांति, सुरक्षा एवं स्थिरता को बढ़ावा देने के लिए आपसी तालमेल के साथ मिलकर काम करने पर भी सहमति बनी है।

पश्चिम एशिया में तनाव और सुरक्षा के नए समीकरण

उल्लेखनीय है कि 7 अक्टूबर 2023 को इज़राइल पर हमास के हमले के बाद से ही पिछले लगभग तीन सालों से पूरे पश्चिम एशिया में तनाव, डर और हिंसा का माहौल बना हुआ है। इस क्षेत्र के लगभग हर छोटे-बड़े देश को कभी न कभी सीमा-पार हमलों, मिसाइल हमलों या ड्रोन हमलों का सामना करना पड़ा है। इस दौरान इज़राइल ने गाज़ा में बड़ा सैन्य अभियान चलाया है, दक्षिणी लेबनान में अपनी घुसपैठ बढ़ाई है और सीरिया के कुछ हिस्सों पर भी कब्जा जमाया है। इसके अलावा ईरान के खिलाफ भी दो बड़े हवाई हमले किए जा चुके हैं। तेहरान की तरफ से भी सऊदी अरब, कुवैत, बहरीन, कतर, संयुक्त अरब अमीरात, ओमान, जॉर्डन और इज़राइल में मौजूद अमेरिकी ठिकानों तथा आम नागरिकों से जुड़ी बुनियादी सुविधाओं को निशाना बनाकर कई हमले किए गए हैं। ऐसे संवेदनशील और खतरनाक हालातों को देखते हुए ही इन तीनों देशों ने अपनी सुरक्षा को पुख्ता करने के लिए यह मजबूत कदम उठाया है।

सैन्य क्षमताओं और तकनीक का होगा आदान-प्रदान

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार यह नया समझौता मुख्य रूप से तीनों देशों के बीच लंबे समय से चले आ रहे त्रिपक्षीय सैन्य संबंधों पर पूरी तरह आधारित है। पाकिस्तान और तुर्किये के पास एक मजबूत रक्षा उद्योग और सैन्य साजो-सामान का अच्छा अनुभव है, जबकि सऊदी अरब अपने भारी तकनीकी खर्च और आर्थिक ताकत के जरिए इस साझेदारी में बड़ा योगदान दे सकता है। हालांकि जानकारों का यह भी मानना है कि इस समझौते में परमाणु हथियार से जुड़ा कोई पहलू शामिल होने की कोई संभावना नहीं है क्योंकि पाकिस्तान की परमाणु प्रतिरोध क्षमता मुख्य रूप से भारत से मिलने वाले सुरक्षा खतरों पर ही केंद्रित है।

यह बात किसी से छिपी नहीं है कि पाकिस्तान दशकों से सऊदी सेना को सैन्य प्रशिक्षण और तकनीकी सहायता देता आ रहा है। इसके अलावा तुर्किये और पाकिस्तान के बीच पहले से ही युद्धपोतों और आधुनिक प्रशिक्षण विमानों का आदान-प्रदान होता रहा है। साल 2023 में तो सऊदी अरब तुर्किये से भारी मात्रा में ड्रोन खरीदने के लिए भी राजी हुआ था जिसे उस समय का सबसे बड़ा रक्षा निर्यात अनुबंध माना गया था। अब इस नए रक्षा समझौते के बाद रक्षा सहयोग के सभी क्षेत्रों का दायरा और अधिक बढ़ेगा, सामूहिक प्रतिरोध क्षमता को नई ताकत मिलेगी और एक साझा सुरक्षा तंत्र विकसित किया जाएगा। तीनों देशों ने इस पहल को क्षेत्रीय स्थिरता और आपसी सुरक्षा के लिए एक ऐतिहासिक और बेहद जरूरी कदम बताया है।

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