दक्षिण कोरिया ने उठाया बड़ा कदम, आर्कटिक रूट से यूरोप के लिए रवाना किया पहला कंटेनर जहाज

दक्षिण कोरिया ने समुद्री व्यापार की दुनिया में एक बहुत बड़ा कदम उठाया है और अपने इतिहास में पहली बार किसी कंटेनर जहाज को आर्कटिक रूट से यूरोप के लिए रवाना कर दिया है। इस पायलट ऑपरेशन का मुख्य मकसद यह देखना है कि क्या आर्कटिक समुद्री मार्ग से व्यापार करना सचमुच फायदेमंद है और क्या इसके जरिए एशिया से यूरोप का सफर ज्यादा आसानी से तय किया जा सकता है। दक्षिण कोरिया की सरकारी समाचार एजेंसी योनहाप ने ओशन मिनिस्ट्री के हवाले से इस बात की पूरी जानकारी दी है।
बुसान बंदरगाह से शुरू हुई ऐतिहासिक यात्रा
दक्षिण कोरिया के दक्षिण-पूर्वी बंदरगाह शहर बुसान से पैनस्टार एक्रो नाम का यह कंटेनर जहाज शनिवार की रात करीब 9 बजे यूरोप के लिए रवाना हुआ। सरकारी जानकारी के अनुसार, इस जहाज के आगामी 30 अगस्त के आसपास नॉर्दर्न सी रूट में प्रवेश करने की उम्मीद है और यह 7 सितंबर के आसपास आर्कटिक के बर्फीले जल क्षेत्र से गुजरेगा। यात्रा के दौरान इस जहाज के अलग-अलग देशों के बंदरगाहों पर रुकने का पूरा शेड्यूल तैयार किया गया है।
योजना के मुताबिक यह जहाज सबसे पहले 9 सितंबर को ब्रिटेन के फेलिक्सस्टो पहुंचेगा। इसके बाद 11 सितंबर को नीदरलैंड के रॉटरडैम और 15 सितंबर को पोलैंड के ग्दान्स्क बंदरगाह पर इसका पहुंचना तय किया गया है। इन सभी जगहों पर अपने काम पूरे करने के बाद जहाज वापसी की राह पकड़ेगा और 5 अक्टूबर को वापस बुसान लौट आएगा। इस तरह से यह पूरी यात्रा लगभग 45 दिनों में पूरी होगी और इस दौरान केवल आर्कटिक जल क्षेत्र से तय की जाने वाली दूरी लगभग 6,400 किलोमीटर होगी।
जहाज की खासियत और उस पर लदा सामान
यह पहली बार है जब दक्षिण कोरिया के किसी कंटेनर जहाज ने आर्कटिक रूट पर इस तरह का पायलट ऑपरेशन किया है। इतना ही नहीं, साल 2016 के बाद यह पहला मौका है जब किसी कोरियाई जहाज ने इस ठंडे मार्ग से यात्रा करने का जोखिम उठाया है। इस ऐतिहासिक यात्रा को अंजाम देने वाले पैनस्टार एक्रो जहाज की कुल क्षमता 2,758 टीईयू यानी ट्वेंटी-फुट इक्विवेलेंट यूनिट है। इस जहाज की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसमें बर्फीले समुद्री क्षेत्रों में सुरक्षित रूप से चलने के लिए विशेष आइस-क्लास क्षमता दी गई है।
बुसान शहर में स्थित पैनस्टार लाइन कंपनी इस जहाज का संचालन करती है। फिलहाल इस जहाज पर कुल 837 टीईयू कार्गो यानी सामान लदा हुआ है। इस सामान में मुख्य तौर पर केमिकल उत्पाद, इस्तेमाल की गई गाड़ियां यानी पुरानी कारें, ऑटो पार्ट्स और कुछ खाली कंटेनर शामिल हैं, जिन्हें सुरक्षित रूप से यूरोप पहुंचाया जा रहा है।
क्यों पड़ी आर्कटिक रूट की जरूरत
आर्कटिक शिपिंग रूट दरअसल आर्कटिक महासागर के ऊपर से गुजरने वाले समुद्री रास्ते हैं। जानकारों का मानना है कि ये रास्ते एशिया और यूरोप के बीच इस्तेमाल होने वाले पुराने और पारंपरिक रास्तों की तुलना में काफी कम दूरी तय करवाते हैं। इससे भविष्य में सामानों का परिवहन और अधिक तेज तथा किफायती हो सकता है। आज के समय में जलवायु परिवर्तन की वजह से आर्कटिक क्षेत्र में लगातार समुद्री बर्फ पिघल रही है, जिसके कारण इन नए रास्तों का इस्तेमाल करने की संभावनाएं तेजी से बढ़ रही हैं।
इसके अलावा, पश्चिम एशिया यानी मिडिल ईस्ट में लंबे समय से जारी संघर्षों के कारण दुनिया भर के मुख्य जलमार्ग बुरी तरह प्रभावित हुए हैं। यही वजह है कि अब तमाम देश और कंपनियां सुरक्षित व्यापार के लिए वैकल्पिक समुद्री मार्गों की तलाश कर रहे हैं और उनमें गहरी रुचि दिखा रहे हैं। दक्षिण कोरिया की सरकार भी लगातार आर्कटिक और उत्तरी समुद्री मार्गों के बढ़ते दायरे को देखते हुए बुसान शहर को देश का सबसे बड़ा और प्रमुख समुद्री केंद्र यानी मैरीटाइम हब बनाने में जुटी हुई है।
राष्ट्रपति ली जे-म्युंग के प्रशासन ने ओशन मिनिस्ट्री के दफ्तर को राजधानी सियोल से हटाकर सीधे बुसान में स्थानांतरित कर दिया है। सरकार का साफ मानना है कि उत्तरी शिपिंग रूट के विस्तार से देश के समुद्री उद्योग को पंख लगेंगे और बुसान शहर पूरी दुनिया में एक बड़े लॉजिस्टिक्स हब के रूप में अपनी मजबूत पहचान बना सकेगा।